हूल दिवस 2026 : झारखंड की राजधानी रांची में हूल दिवस 2026 के अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वीर शहीद सिदो-कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू समेत संथाल हूल आंदोलन के सभी अमर सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। मोरहाबादी स्थित सिदो-कान्हू पार्क पहुंचकर मुख्यमंत्री ने शहीदों की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और उनके संघर्ष को देश और समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि “अन्याय, शोषण और अत्याचार के खिलाफ जली क्रांति की चिंगारी कभी नहीं बुझ सकती। वीर शहीदों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।” उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान उसके संघर्ष, संस्कृति और बलिदान की विरासत से जुड़ी हुई है।
हूल दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि संघर्ष की प्रेरणा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में कहा कि हूल दिवस केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सिदो-कान्हू और उनके साथियों ने जिस साहस के साथ अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, वह आज भी पूरे देश के लिए प्रेरणा है।
उन्होंने कहा कि समाज में जब भी अन्याय और असमानता बढ़ेगी, तब-तब हूल आंदोलन की भावना लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित करती रहेगी। यह आंदोलन केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक है।
1855 के संथाल हूल आंदोलन का इतिहास
हर वर्ष 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1855 में संथाल परगना क्षेत्र के सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू ने अंग्रेजी हुकूमत, महाजनों और जमींदारी शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह की शुरुआत की थी।
इस आंदोलन को संथाल हूल कहा जाता है। ‘हूल’ का अर्थ होता है विद्रोह या क्रांति। हजारों आदिवासियों ने अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए इस आंदोलन में भाग लिया। हालांकि अंग्रेजी शासन ने इस आंदोलन को बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन इसने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी और भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
झारखंड के गौरव का प्रतीक हैं सिदो-कान्हू
मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड की नई पीढ़ी को अपने इतिहास और शहीदों के बलिदान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार लगातार आदिवासी संस्कृति, परंपरा और विरासत को संरक्षित करने की दिशा में काम कर रही है।
उन्होंने कहा कि सिदो-कान्हू जैसे महान सेनानियों का जीवन हमें यह सिखाता है कि अन्याय के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए। उनके संघर्ष और बलिदान को हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा।
शहीदों के आदर्शों पर चलने का आह्वान
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्यवासियों से अपील करते हुए कहा कि सभी लोग शहीदों के बताए रास्ते पर चलें और समाज में समानता, भाईचारे तथा न्याय की भावना को मजबूत करें।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और अधिकार के साथ जीवन जी सके। यही हूल आंदोलन का मूल संदेश भी है।
कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद
हूल दिवस के अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में राज्य सरकार के कई मंत्री, विधायक, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने वीर शहीदों की प्रतिमाओं पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया।
कार्यक्रम के दौरान संथाल हूल आंदोलन के इतिहास और उसके महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। उपस्थित लोगों ने शहीदों के आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
झारखंड की संस्कृति और अस्मिता से जुड़ा है हूल दिवस
हूल दिवस झारखंड की सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी गौरव का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह दिन केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि समाज को न्याय, समानता और अधिकारों के प्रति जागरूक करने का भी संदेश देता है।
राज्यभर में इस अवसर पर विभिन्न जिलों में श्रद्धांजलि सभाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम, विचार गोष्ठियां और जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी संस्थानों में भी वीर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई।
निष्कर्ष
हूल दिवस 2026 के अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का संदेश केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने समाज को यह याद दिलाया कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष की भावना कभी समाप्त नहीं होती। सिदो-कान्हू और उनके साथियों का बलिदान झारखंड ही नहीं, पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज भी हूल आंदोलन सामाजिक न्याय, स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बना हुआ है।







