ISKCON Jharkhand : रांची में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में झारखंड के राज्यपाल ने कहा कि उनका ISKCON यानी International Society for Krishna Consciousness से वर्षों पुराना गहरा संबंध रहा है और यह संगठन अब आदिवासी समाज के साथ भी अधिक जुड़ाव स्थापित करे। उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों से है, ऐसे में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं को आदिवासी समुदायों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कार आधारित कार्यों को बढ़ाने की आवश्यकता है।
ISKCON को बताया सेवा और संस्कृति का प्रतीक
राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि ISKCON केवल धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि सेवा, संस्कृति और मानवता के मूल्यों को आगे बढ़ाने वाला वैश्विक संगठन है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति के सबसे निकट रहने वाला समाज है और उनकी जीवनशैली में आध्यात्मिकता स्वाभाविक रूप से मौजूद है। ऐसे में यदि ISKCON जैसे संगठन गांवों और आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पौष्टिक भोजन और संस्कार आधारित गतिविधियों को बढ़ावा दें, तो इससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन आएगा।
आदिवासी संस्कृति को बचाने पर जोर
उन्होंने कहा कि झारखंड की जनजातीय संस्कृति सदियों पुरानी है और इसमें प्रकृति संरक्षण, सामुदायिक सहयोग तथा सामाजिक समानता की अद्भुत परंपरा देखने को मिलती है। राज्यपाल ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक विकास के दौर में आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि कई बार विकास के नाम पर जनजातीय समुदायों की परंपराएं और मूल जीवनशैली प्रभावित होती हैं, इसलिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दिशा में काम करना चाहिए।
युवाओं के नैतिक विकास की जरूरत
कार्यक्रम में राज्यपाल ने ISKCON के सेवा कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि संस्था ने देश और दुनिया में शिक्षा, भोजन वितरण और आध्यात्मिक जागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने कहा कि यदि यही मॉडल झारखंड के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंचे, तो हजारों युवाओं और बच्चों को नई दिशा मिल सकती है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं के नैतिक विकास पर बल देते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को केवल तकनीकी शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक शिक्षा की भी जरूरत है।
आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस
राज्यपाल ने कहा कि झारखंड के कई आदिवासी क्षेत्रों में अभी भी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। वहां सामाजिक संगठनों की भागीदारी बढ़ाकर बेहतर परिवर्तन लाया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि ISKCON आदिवासी युवाओं के लिए कौशल विकास, संस्कृत शिक्षा, योग, जैविक खेती और स्वरोजगार से जुड़े कार्यक्रम भी चला सकता है। इससे गांवों में रोजगार बढ़ेगा और युवा मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे।
जनजातीय कला और संस्कृति को मिले राष्ट्रीय पहचान
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज हमेशा से सामूहिक जीवन और सामाजिक संतुलन का प्रतीक रहा है। वहां परिवार और समाज की संरचना मजबूत होती है, जो आधुनिक समाज के लिए भी सीख का विषय है। राज्यपाल ने कहा कि जनजातीय समुदायों की कला, लोक संगीत, नृत्य और परंपराओं को national स्तर पर पहचान दिलाने की जरूरत है। उन्होंने सांस्कृतिक संगठनों से आग्रह किया कि वे गांवों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम आयोजित करें ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।
ISKCON ने भी बढ़ाया सहयोग का हाथ
कार्यक्रम में मौजूद ISKCON के प्रतिनिधियों ने भी राज्यपाल के विचारों का स्वागत किया। संस्था की ओर से कहा गया कि झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में सेवा कार्यों को और विस्तार देने की दिशा में योजनाएं तैयार की जा रही हैं। संस्था पहले से ही कई राज्यों में आदिवासी समुदायों के बीच शिक्षा, भोजन वितरण और आध्यात्मिक कार्यक्रम चला रही है।
सामाजिक संगठनों की भूमिका अहम
विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी निवास करती है, वहां सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। राज्य में अनुसूचित जनजातियों की बड़ी आबादी आज भी ग्रामीण और वन क्षेत्रों में रहती है, जहां बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में सरकार और सामाजिक संगठनों के साझा प्रयास से विकास की नई संभावनाएं तैयार की जा सकती हैं।
संस्कृति और विकास साथ-साथ चलें
राज्यपाल ने अंत में कहा कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब विकास के साथ संस्कृति और मानवीय मूल्यों को भी महत्व दिया जाए। उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान उसकी विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि है, जिसे सुरक्षित रखते हुए विकास की नई दिशा तय करनी होगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में ISKCON और आदिवासी समाज के बीच सहयोग बढ़ेगा और इससे सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक जागरूकता को नई मजबूती मिलेगी।







