Jharkhand Ambulance Scam : झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है। राज्य में करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई एंबुलेंसों को लेकर नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि लगभग 558 करोड़ रुपये की लागत से खरीदी गई कई एंबुलेंसें उपयोग में नहीं हैं और सरकारी लापरवाही के कारण अस्पताल परिसरों या गोदामों में खड़ी-खड़ी खराब हो रही हैं। इस पूरे मामले को उन्होंने बड़ा घोटाला बताते हुए CBI जांच की मांग की है।
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जनता के टैक्स के पैसों से खरीदी गई स्वास्थ्य सेवाओं की गाड़ियां यदि सड़क पर मरीजों की जान बचाने के बजाय कबाड़ बन जाएं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का गंभीर मामला है।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि राज्य सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक आपातकालीन चिकित्सा सुविधा पहुंचाने के उद्देश्य से बड़े स्तर पर एंबुलेंस खरीदी थीं। इन एंबुलेंसों को आधुनिक चिकित्सा उपकरणों से लैस बताया गया था ताकि दुर्घटना, गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को तत्काल इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया जा सके।
लेकिन अब आरोप है कि इन एंबुलेंसों में से कई जमीन पर उपयोग में नहीं हैं। कुछ बिना ड्राइवर के खड़ी हैं, कुछ में तकनीकी खराबी है, जबकि कई एंबुलेंसों का संचालन ही शुरू नहीं हो सका। विपक्ष का दावा है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्वास्थ्य सेवा को अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
बाबूलाल मरांडी ने इसे “स्वास्थ्य व्यवस्था में संगठित भ्रष्टाचार” करार देते हुए कहा कि इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी बिना उच्च स्तर की मिलीभगत के संभव नहीं हो सकती।
CBI जांच की मांग क्यों?
मरांडी ने आरोप लगाया कि राज्य में कई विभागों में लगातार वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच करनी है तो राज्य एजेंसियों के बजाय केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराई जानी चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि यदि स्वतंत्र एजेंसी जांच करे तो एंबुलेंस खरीद, टेंडर प्रक्रिया, भुगतान और संचालन से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। मरांडी ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य विभाग में पहले भी टेंडर और खरीद प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग पर उठे बड़े सवाल
इस पूरे विवाद के बाद कई अहम सवाल उठ रहे हैं:
- क्या एंबुलेंस खरीद में जरूरत से ज्यादा खर्च किया गया?
- क्या टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी थी?
- क्या तकनीकी जांच के बिना गाड़ियों की खरीद हुई?
- क्या संचालन के लिए पर्याप्त ड्राइवर और तकनीकी स्टाफ नियुक्त किए गए?
- क्या रखरखाव की व्यवस्था पहले से तय थी?
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी स्वास्थ्य परियोजना में केवल उपकरण खरीद लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके संचालन और रखरखाव की मजबूत व्यवस्था भी जरूरी होती है। यदि ऐसा नहीं हो तो करोड़ों की परियोजनाएं कुछ वर्षों में ही बेकार हो जाती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर
झारखंड के कई ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे क्षेत्रों में एंबुलेंस सेवा जीवन रक्षक भूमिका निभाती है। गर्भवती महिलाओं, सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों और गंभीर मरीजों के लिए समय पर एंबुलेंस मिलना बेहद जरूरी होता है।
यदि करोड़ों की एंबुलेंसें उपयोग में नहीं हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान ग्रामीण गरीबों को उठाना पड़ता है। कई मामलों में मरीजों को निजी वाहन या ट्रैक्टर से अस्पताल ले जाने की खबरें सामने आती रही हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एंबुलेंस नेटवर्क प्रभावी तरीके से काम करे तो मातृ मृत्यु दर और दुर्घटना में होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विपक्ष का हमला तेज
बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि जनता के पैसों की बर्बादी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल योजनाओं की घोषणा करती है, लेकिन जमीन पर उनका सही संचालन सुनिश्चित नहीं करती।
मरांडी इससे पहले भी विभिन्न मामलों में CBI जांच की मांग उठाते रहे हैं। उन्होंने कथित ट्रेजरी घोटाला, शराब घोटाला और स्वास्थ्य विभाग के टेंडर मामलों में भी निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
उनका कहना है कि झारखंड में भ्रष्टाचार की जांच राज्य एजेंसियों से कराने पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते हैं, इसलिए केंद्रीय एजेंसी से जांच कराना जरूरी है।
सरकार की ओर से क्या कहा गया?
हालांकि इस मामले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि विभाग पूरे मामले की समीक्षा कर रहा है। सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि विपक्ष राजनीतिक लाभ लेने के लिए आरोप लगा रहा है और वास्तविक स्थिति की जांच के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
सरकारी पक्ष यह भी कह सकता है कि कुछ एंबुलेंस तकनीकी कारणों या प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण अस्थायी रूप से बंद हैं और उन्हें जल्द चालू किया जाएगा। हालांकि विपक्ष इन दावों को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा।
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
झारखंड में स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया पहले भी विवादों में रही है। टेंडर आवंटन, उपकरण खरीद और मेडिकल सप्लाई में अनियमितताओं के आरोप कई बार सामने आते रहे हैं।
कुछ रिपोर्टों में आरोप लगाया गया था कि कई कंपनियों को एक ही पते से संचालित होने के बावजूद बड़े सरकारी टेंडर दिए गए। बाबूलाल मरांडी ने स्वास्थ्य विभाग की निविदा प्रक्रिया में भी गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया था।
इसी कारण अब एंबुलेंस मामले को भी लोग व्यापक स्वास्थ्य घोटाले के नजरिए से देखने लगे हैं।
जनता में बढ़ रही नाराजगी
सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर लोग इस मुद्दे पर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि राज्य में कई अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयों की कमी है, जबकि दूसरी ओर करोड़ों की एंबुलेंसें बेकार पड़ी हैं।
जनता का सवाल है कि यदि स्वास्थ्य सेवाओं पर इतना बड़ा बजट खर्च किया जा रहा है तो उसका लाभ आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंच रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नई योजनाओं की घोषणा से स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत होती है।
विशेषज्ञों ने क्या सुझाव दिए?
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए सरकार को कुछ अहम कदम उठाने चाहिए:
- सभी एंबुलेंसों का डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए
- नियमित तकनीकी जांच और रखरखाव सुनिश्चित हो
- ड्राइवर और मेडिकल स्टाफ की पर्याप्त नियुक्ति हो
- खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए
- स्वतंत्र एजेंसी से ऑडिट कराया जाए
- हर जिले में एंबुलेंस की स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो
विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो सकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल
झारखंड जैसे राज्य में जहां ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से सीमित हैं, वहां एंबुलेंस सेवा का प्रभावी होना बेहद जरूरी है। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सेवाएं जमीन पर नहीं दिखतीं, तो यह शासन व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नई योजनाओं और बजट घोषणाओं से स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती, बल्कि उसकी निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होती है।
निष्कर्ष
558 करोड़ रुपये की एंबुलेंसों को लेकर उठे सवाल झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि जनता के स्वास्थ्य अधिकारों के साथ बड़ा खिलवाड़ माना जाएगा।अब सभी की नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करती है। क्या मामले की स्वतंत्र जांच होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जनता को वह स्वास्थ्य सुविधा मिल पाएगी जिसके लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति और स्वास्थ्य प्रशासन दोनों की दिशा तय कर सकते हैं।







