Two Finger Test Ban : झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में पीड़ितों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पुलिस किसी भी स्थिति में एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती। साथ ही, अदालत ने यह भी दोहराया कि दुष्कर्म पीड़िताओं पर किया जाने वाला तथाकथित “टू-फिंगर टेस्ट” पूरी तरह प्रतिबंधित है और इसका कोई कानूनी या वैज्ञानिक आधार नहीं है।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देशभर में महिलाओं की सुरक्षा, यौन अपराधों की जांच प्रक्रिया और पीड़ितों के सम्मानजनक व्यवहार को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि जांच एजेंसियों और चिकित्सा संस्थानों को कानून और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप कार्य करना होगा।
एफआईआर दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी
अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला या पीड़िता यौन अपराध की शिकायत लेकर थाने पहुंचती है तो पुलिस का पहला दायित्व एफआईआर दर्ज करना है। शिकायत की सत्यता या अन्य पहलुओं की जांच बाद में की जा सकती है, लेकिन प्रारंभिक स्तर पर मामला दर्ज करने से इनकार करना कानून की भावना के विपरीत है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कई मामलों में पीड़िताएं पहले ही मानसिक आघात से गुजर रही होती हैं। यदि उन्हें थाने में भी असंवेदनशील व्यवहार का सामना करना पड़े तो न्याय पाने की प्रक्रिया और कठिन हो जाती है। इसलिए अदालतों ने समय-समय पर पुलिस को संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है टू-फिंगर टेस्ट?
टू-फिंगर टेस्ट एक पुरानी और विवादित चिकित्सीय प्रक्रिया रही है, जिसमें यह जांचने की कोशिश की जाती थी कि महिला पहले यौन संबंध बना चुकी है या नहीं। चिकित्सा और कानूनी विशेषज्ञ लंबे समय से इस परीक्षण का विरोध करते रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह परीक्षण न केवल वैज्ञानिक रूप से अविश्वसनीय है, बल्कि पीड़िता की गरिमा और निजता का भी उल्लंघन करता है। यही कारण है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही इस प्रक्रिया को असंवैधानिक और अमानवीय घोषित कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही लगा चुका है रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई महत्वपूर्ण फैसलों में स्पष्ट किया है कि टू-फिंगर टेस्ट का दुष्कर्म के आरोपों से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने कहा था कि यह परीक्षण इस गलत धारणा पर आधारित है कि यदि कोई महिला पहले यौन रूप से सक्रिय रही है तो उसके साथ बलात्कार नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह गलत और महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताया था।
सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसा परीक्षण पीड़िता को दोबारा मानसिक पीड़ा देता है और उसके सम्मान को ठेस पहुंचाता है। इसलिए इसे किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जाना चाहिए।
मेडिकल जांच का उद्देश्य क्या होना चाहिए?
हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में मेडिकल जांच का उद्देश्य केवल वैज्ञानिक और फोरेंसिक साक्ष्य जुटाना होना चाहिए। जांच प्रक्रिया इस प्रकार होनी चाहिए कि पीड़िता की गरिमा, निजता और मानसिक स्थिति का पूरा सम्मान बना रहे।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक फोरेंसिक तकनीकें अपराध की जांच के लिए पर्याप्त हैं। ऐसे में पुरानी और अपमानजनक प्रक्रियाओं की कोई आवश्यकता नहीं है।
महिला की यौन पृष्ठभूमि अप्रासंगिक
न्यायालयों ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि किसी महिला का पूर्व यौन जीवन या उसका व्यक्तिगत इतिहास यह तय नहीं करता कि उसके साथ अपराध हुआ है या नहीं। कानून की नजर में हर महिला को समान सुरक्षा और सम्मान प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि किसी पीड़िता के चरित्र या उसकी पूर्व यौन गतिविधियों को सहमति का आधार नहीं माना जा सकता। ऐसे तथ्यों को अदालत में महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।
पुलिस और डॉक्टरों के लिए स्पष्ट निर्देश
अदालत की टिप्पणी केवल पुलिस तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है। यदि कोई चिकित्सा अधिकारी प्रतिबंधित परीक्षण करता है तो इसे गंभीर पेशेवर कदाचार माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुका है कि टू-फिंगर टेस्ट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों को भी निर्देश दिए गए हैं कि चिकित्सा पाठ्यक्रमों और प्रशिक्षण सामग्री से इस परीक्षण से जुड़े सभी संदर्भ हटाए जाएं।
पीड़ित केंद्रित न्याय व्यवस्था की आवश्यकता
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यौन अपराध मामलों में पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। जांच और न्यायिक प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे पीड़िता को दोबारा अपमान या मानसिक उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे पुलिस और चिकित्सा संस्थानों को यह संदेश मिलेगा कि कानून केवल अपराध की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित के सम्मान और अधिकारों की रक्षा भी उसकी जिम्मेदारी है।
जागरूकता बढ़ाने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि कानून बनने और अदालतों के आदेश देने के बावजूद कई बार जमीनी स्तर पर जागरूकता की कमी देखने को मिलती है। पुलिसकर्मियों, डॉक्टरों और अन्य संबंधित अधिकारियों को नियमित प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है ताकि वे नवीनतम कानूनी प्रावधानों और दिशानिर्देशों से अवगत रहें।
साथ ही आम लोगों को भी यह जानकारी होनी चाहिए कि यौन अपराध की शिकायत दर्ज कराना उनका अधिकार है और किसी भी थाने को एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने का अधिकार नहीं है।
निष्कर्ष
झारखंड हाईकोर्ट की यह टिप्पणी महिलाओं और यौन अपराध पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि दुष्कर्म मामलों में एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता और टू-फिंगर टेस्ट जैसी अमानवीय प्रक्रिया का कोई स्थान नहीं है। यह फैसला न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील, वैज्ञानिक और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में एक मजबूत संदेश देता है।







