बपतिस्मा दिवस : रांची के जीईएल चर्च हेथा कोटा में सोमवार को बपतिस्मा दिवस श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में विश्वासी, चर्च पदाधिकारी, पादरीगण और विभिन्न कलीसियाओं के सदस्य उपस्थित हुए। कार्यक्रम में उन चार उरांव पुरखाओं को विशेष रूप से याद किया गया, जिन्होंने 9 जून 1850 को बपतिस्मा ग्रहण कर छोटानागपुर क्षेत्र में ईसाई धर्म के इतिहास की एक नई शुरुआत की थी।
यह दिवस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि इतिहास, विश्वास और सामाजिक परिवर्तन की याद दिलाने वाला अवसर भी है। चर्च परिसर में आयोजित विशेष आराधना सभा में लोगों ने पूर्वजों के साहस, समर्पण और विश्वास को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
क्या है बपतिस्मा दिवस का ऐतिहासिक महत्व?
छोटानागपुर क्षेत्र में ईसाई धर्म के इतिहास में 9 जून 1850 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन चार उरांव पुरुषों ने जर्मन मिशनरियों के माध्यम से बपतिस्मा ग्रहण किया था। इनमें हेथा कोटा के नवीन डोमन तिर्की, चिताकुनी के केशो भगत, बंधु उरांव तथा करंदा के घूरन उरांव शामिल थे। इन चारों के बपतिस्मा ग्रहण करने के बाद क्षेत्र में ईसाई धर्म के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इतिहासकारों के अनुसार यह घटना केवल धार्मिक परिवर्तन तक सीमित नहीं थी, बल्कि उस समय के आदिवासी समाज में शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और आत्मसम्मान की भावना को भी मजबूत करने वाली साबित हुई।
विशेष आराधना सभा का हुआ आयोजन
बपतिस्मा दिवस के अवसर पर चर्च में विशेष धन्यवादी आराधना आयोजित की गई। इस दौरान भजन-कीर्तन, प्रार्थना और बाइबल वाचन के माध्यम से लोगों को आध्यात्मिक संदेश दिया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि बपतिस्मा केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि प्रभु यीशु मसीह के प्रति समर्पण, विश्वास और नए जीवन का प्रतीक है।
चर्च नेताओं ने कहा कि आज की पीढ़ी को अपने इतिहास और पूर्वजों के संघर्षों को जानना चाहिए। चार उरांव पुरखाओं ने जिस साहस के साथ उस दौर में बपतिस्मा ग्रहण किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
मॉडरेटर ने युवाओं को दिया प्रेरक संदेश
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चर्च के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा कि वर्तमान समय में समाज तेजी से बदल रहा है। युवाओं के सामने रोजगार, शिक्षा, तकनीक और सामाजिक चुनौतियों जैसी कई समस्याएं हैं। ऐसे समय में विश्वास, नैतिकता और आध्यात्मिक मूल्यों का महत्व और बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा कि बपतिस्मा दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वयं को आत्मिक रूप से मजबूत बनाने का भी दिन है। समाज में प्रेम, भाईचारा, सेवा और मानवता के मूल्यों को बढ़ावा देना ही इस दिवस का वास्तविक संदेश है।
चर्च इतिहास को संरक्षित करने पर जोर
समारोह में चर्च के इतिहास और उसके विकास पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने बताया कि 1845 में जर्मनी से आए मिशनरियों ने रांची में अपने मिशन की शुरुआत की थी। इसके बाद धीरे-धीरे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य हुए।
चर्च पदाधिकारियों ने कहा कि इतिहास को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। इसके लिए चर्च स्तर पर विभिन्न दस्तावेजों, पुस्तकों और ऐतिहासिक अभिलेखों को सुरक्षित रखने का कार्य भी किया जा रहा है।
समाज सुधार में चर्च की भूमिका
वक्ताओं ने कहा कि चर्च ने केवल धार्मिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, महिलाओं के सशक्तिकरण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने में चर्च की भूमिका सराहनीय रही है।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने कहा कि आज भी समाज में नशाखोरी, अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में चर्च और समाज को मिलकर इन समस्याओं के समाधान के लिए काम करना होगा।
पूर्वजों के योगदान को किया गया याद
बपतिस्मा दिवस के अवसर पर उपस्थित लोगों ने चारों उरांव पुरखाओं के प्रति आभार व्यक्त किया। वक्ताओं ने कहा कि यदि उन्होंने उस समय साहसिक निर्णय नहीं लिया होता, तो संभवतः चर्च का इतिहास आज इतना व्यापक नहीं होता।
उनके योगदान को याद करते हुए कहा गया कि उन्होंने केवल अपने जीवन को नहीं बदला, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी विश्वास और आध्यात्मिकता का मार्ग प्रशस्त किया। यही कारण है कि हर वर्ष 9 जून को विशेष श्रद्धा और सम्मान के साथ बपतिस्मा दिवस मनाया जाता है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत
आज के दौर में जब समाज कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब बपतिस्मा दिवस लोगों को अपने मूल्यों और विश्वास की ओर लौटने का संदेश देता है। चर्च नेताओं ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने पूर्वजों के आदर्शों को अपनाएं और समाज के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
उन्होंने कहा कि विश्वास, सेवा, समर्पण और मानवता जैसे मूल्यों को अपनाकर ही एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है। यही संदेश बपतिस्मा दिवस का मूल उद्देश्य भी है।
निष्कर्ष
रांची के जीईएल चर्च हेथा कोटा में आयोजित बपतिस्मा दिवस समारोह आस्था, इतिहास और सामाजिक चेतना का संगम साबित हुआ। इस अवसर पर चार उरांव पुरखाओं के योगदान को याद करते हुए लोगों ने उनके साहस और विश्वास को नमन किया। कार्यक्रम ने न केवल चर्च के गौरवशाली इतिहास को सामने रखा, बल्कि नई पीढ़ी को अपने मूल्यों और विरासत से जुड़ने की प्रेरणा भी दी। बपतिस्मा दिवस आज भी विश्वास, समर्पण और सामाजिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बना हुआ है।







