Illegal Fetal Sex Determination : झारखंड की राजधानी रांची में अवैध भ्रूण लिंग जांच (फीटल सेक्स डिटरमिनेशन) के एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश होने से स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन में हड़कंप मच गया है। प्रतिबंधित होने के बावजूद गुप्त रूप से चल रहे इस नेटवर्क पर की गई कार्रवाई ने एक बार फिर बेटियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को उजागर कर दिया है। हालिया छापेमारी में कई लोगों को हिरासत में लिया गया है और पूरे नेटवर्क की जांच तेज कर दी गई है।
गुप्त सूचना के बाद शुरू हुई कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग को पिछले कुछ दिनों से सूचना मिल रही थी कि रांची और आसपास के इलाकों में कुछ लोग गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग बताने का अवैध कारोबार चला रहे हैं। आरोप है कि इसके लिए गर्भवती महिलाओं से मोटी रकम वसूली जाती थी और उन्हें गुप्त स्थानों पर ले जाकर जांच कराई जाती थी।
सूचना मिलने के बाद अधिकारियों ने विशेष टीम गठित की। कई दिनों तक निगरानी रखने और सबूत जुटाने के बाद संदिग्ध केंद्रों पर छापेमारी की गई। कार्रवाई के दौरान तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज व उपकरण जब्त किए गए।
कैसे काम करता था पूरा नेटवर्क?
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह के सदस्य दलालों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं तक पहुंचते थे। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग बता सकते हैं। इसके बदले हजारों रुपये की मांग की जाती थी।
जांच एजेंसियों को शक है कि इस नेटवर्क में कई लोग शामिल हो सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग अब यह पता लगाने में जुटा है कि इस अवैध कारोबार का दायरा सिर्फ रांची तक सीमित था या इसका संबंध दूसरे जिलों और राज्यों से भी था।
कानूनन अपराध है भ्रूण लिंग जांच
भारत में भ्रूण के लिंग की जांच और उसे बताना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसे रोकने के लिए केंद्र सरकार ने पीसीपीएनडीटी एक्ट (Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques Act) लागू किया है। इस कानून के तहत गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग बताना, उसका प्रचार करना या ऐसी जांच कराना गंभीर अपराध माना जाता है।
दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति को जेल की सजा और भारी जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा मेडिकल संस्थानों का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।
बेटियों के खिलाफ अपराध पर रोक लगाने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रूण लिंग जांच जैसी गतिविधियां समाज में लिंग असंतुलन को बढ़ावा देती हैं। कई मामलों में लड़की होने की जानकारी मिलने पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया जाता है, जिससे कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
सरकार और सामाजिक संगठनों द्वारा लंबे समय से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद कुछ लोग आर्थिक लाभ के लिए कानून की धज्जियां उड़ाने से बाज नहीं आते।
स्वास्थ्य विभाग की सख्ती
रांची में हुई इस कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। विभाग ने निजी क्लीनिकों, अल्ट्रासाउंड केंद्रों और संदिग्ध संस्थानों की निगरानी बढ़ा दी है।
अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में और भी जांच अभियान चलाए जाएंगे। जिन केंद्रों के खिलाफ शिकायतें मिल रही हैं, उनकी गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जा रही है।
कई पहलुओं की हो रही जांच
गिरफ्तार किए गए आरोपियों से पूछताछ के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि कहीं किसी चिकित्सा संस्थान या स्वास्थ्यकर्मी की भूमिका तो नहीं रही।
अधिकारियों को उम्मीद है कि पूछताछ से पूरे गिरोह का खुलासा हो सकता है और इस अवैध कारोबार की जड़ तक पहुंचा जा सकेगा।
समाज के लिए गंभीर चेतावनी
रांची में सामने आया यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए गंभीर चेतावनी भी है। तकनीक का दुरुपयोग कर बेटियों के जन्म को रोकने की कोशिशें आज भी जारी हैं। ऐसे में प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और समाज को मिलकर इस मानसिकता के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है। लोगों में जागरूकता बढ़ाने और बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने की भी आवश्यकता है।
निष्कर्ष
रांची में अवैध भ्रूण लिंग जांच गिरोह का भंडाफोड़ झारखंड में स्वास्थ्य विभाग की बड़ी सफलता माना जा रहा है। इस कार्रवाई से साफ संदेश गया है कि कानून तोड़कर बेटियों के अस्तित्व से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। अब सभी की नजर जांच एजेंसियों पर है कि वे इस पूरे नेटवर्क का कितना बड़ा खुलासा कर पाती हैं और कितने लोगों को कानून के दायरे में लाया जाता है।







