International Women’s Day : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राजधानी रांची स्थित प्रेस क्लब में महिलाओं के अधिकार, सम्मान और समानता को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम आई.एल.ए.ए. (इनिशिएटिव फॉर लीगल अवेयरनेस एंड असिस्टेंस ट्रस्ट) द्वारा आयोजित किया गया, जिसका विषय था – “एक्सेलरेट एक्शन: ट्रांसफॉर्मिंग वीमेन राइट्स इन्टू लिव्ड रियलिटी अमिडस्ट ऑनगोइंग चैलेंजेज़।”
इस कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों को केवल कागजों और कानूनों तक सीमित न रखकर उन्हें वास्तविक जीवन में लागू करने की दिशा में समाज को प्रेरित करना था। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया और महिलाओं की वर्तमान स्थिति, कानूनी अधिकारों तथा सामाजिक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम में कई प्रमुख हस्तियों की रही उपस्थिति
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ राजनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय उपस्थित रहे। उनके साथ-साथ कई प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भी मंच साझा किया और महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।इस अवसर पर वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज भले ही महिलाओं के अधिकारों को लेकर कई कानून बनाए गए हों, लेकिन समाज में अभी भी अनेक ऐसी चुनौतियां मौजूद हैं जिनके कारण महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
महिलाओं के अधिकारों को व्यवहार में लागू करने की जरूरत
कार्यक्रम में एडवोकेट दिव्यप्रकाश ने “एक्सेलरेट एक्शन टुवर्ड्स वीमेन – ए होलिस्टिक अप्रोच” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि इन कानूनों को समाज में प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए।उन्होंने कहा कि कई बार महिलाएं अपने अधिकारों के बारे में जानकारी के अभाव में न्याय से वंचित रह जाती हैं। इसलिए कानूनी जागरूकता अभियान चलाना और महिलाओं को न्यायिक प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देना बेहद जरूरी है।
महिला संघर्ष का लंबा इतिहास
कार्यक्रम में प्रोफेसर स्वाति ने “महिला संघर्ष का इतिहास” विषय पर बोलते हुए कहा कि महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई कोई नई नहीं है, बल्कि इसका इतिहास काफी लंबा और संघर्षपूर्ण रहा है।
उन्होंने बताया कि दुनिया भर में महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार, मतदान अधिकार और सामाजिक समानता के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है। आज जो अधिकार महिलाओं को प्राप्त हैं, वे कई पीढ़ियों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम हैं।
डायन-बिसाही जैसी कुप्रथाओं पर चिंता
सामाजिक कार्यकर्ता अमल आज़ाद ने झारखंड में प्रचलित अमानवीय कुप्रथा डायन-बिसाही के सामाजिक प्रभावों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में भी इस प्रकार की कुप्रथाएं समाज के लिए बेहद शर्मनाक हैं।उन्होंने कहा कि डायन-बिसाही के नाम पर कई महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है, उनके साथ हिंसा होती है और कई मामलों में उनकी हत्या तक कर दी जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए समाज को जागरूक होने और कानून को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है।
आदिवासी महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा
आदिवासी नारीवादी चिंतक प्रोफेसर रजनी मुर्मू ने अपने संबोधन में आदिवासी महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर प्रकाश डाला।उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन आधुनिक सामाजिक ढांचे में कई बार उनकी पहचान और अधिकारों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसलिए आदिवासी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनकी पहचान को सम्मान देने की जरूरत है।
कार्यस्थल पर सुरक्षा और POSH अधिनियम
सुश्री नीपा बसु ने कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने POSH Act (Prevention of Sexual Harassment Act) के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया।उन्होंने कहा कि कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न की घटनाएं महिलाओं के आत्मविश्वास और करियर को प्रभावित करती हैं। इसलिए हर संस्थान में POSH अधिनियम का सही तरीके से पालन होना चाहिए और शिकायतों के निपटारे के लिए प्रभावी तंत्र मौजूद होना चाहिए।
शिक्षा से सशक्तिकरण संभव
विमेंस कॉलेज की प्राचार्या डॉ. विनीता सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा महिलाओं के सशक्तिकरण का सबसे मजबूत माध्यम है।उन्होंने कहा कि जब महिलाएं शिक्षित होती हैं तो वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है।
जेलों में महिलाओं की स्थिति पर चिंता
सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता अलोका कुजूर ने भारत की जेलों में महिलाओं की स्थिति और उनके अधिकारों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि जेलों में बंद महिलाओं के साथ कई प्रकार की सामाजिक और मानसिक समस्याएं जुड़ी होती हैं।उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जेलों में बंद महिलाओं के लिए बेहतर सुविधाएं, स्वास्थ्य सेवाएं और पुनर्वास कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाने चाहिए ताकि वे समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें।
युद्ध और महिलाओं पर प्रभाव
कार्यक्रम में सुभ्रोतो चटर्जी ने “वार एंड वीमेन” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी भी संघर्ष या युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है।उन्होंने कहा कि युद्ध की परिस्थितियों में महिलाओं को हिंसा, विस्थापन और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। इसलिए शांति और समानता की स्थापना के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है।
समाज की सामूहिक जिम्मेदारी
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने अपने संबोधन में कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।उन्होंने कहा कि महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और उन्हें आजीविका के बेहतर अवसर प्रदान करना जरूरी है। जब महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी, तभी समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो सकेगी।
संयोजक मंडली की महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यक्रम के सफल आयोजन में संयोजक मंडली की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस आयोजन को सफल बनाने में आर्यन, प्रोफेसर सचिन इंदीवर, सुश्री हेमा गायकवाड़, निशाद खान और प्रिया साव का विशेष योगदान रहा।इन सभी ने कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने, वक्ताओं को आमंत्रित करने और पूरे आयोजन को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने में अहम भूमिका निभाई।
आभार के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। आयोजकों ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में जागरूकता बढ़ाने और महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उन्हें समान अवसर प्रदान करने के लिए समाज, कानून और संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। तभी एक ऐसा समाज बन सकेगा जहां महिलाएं सम्मान, सुरक्षा और समानता के साथ अपना जीवन जी सकें।




