टोटका के शक में झारखंड एक बार फिर ऐसी दिल दहला देने वाली घटना से रू-बरू हुआ है, जिसने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। झारखंड के खूंटी जिले में एक सात वर्षीय बच्चे की निर्मम हत्या का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस जघन्य वारदात में शामिल दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि हत्या का कारण कथित तौर पर टोना-टोटका और अंधविश्वास से जुड़ा शक था। यह घटना न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आधुनिक दौर में भी कुप्रथाएँ किस कदर जानलेवा बन सकती हैं।
घटना का पूरा घटनाक्रम
पुलिस के अनुसार, यह मामला खूंटी जिले के मारंगहदा थाना क्षेत्र के एक आदिवासी बहुल गांव से जुड़ा है। मृतक सात साल का मासूम था, जो रोज की तरह घर के आसपास खेल रहा था। आरोप है कि गांव के ही दो लोगों ने बच्चे को बहला-फुसलाकर चॉकलेट दी और उसे जंगल की ओर ले गए। वहां सुनसान जगह पर कुदाल जैसे धारदार औजार से उस पर हमला किया गया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
घटना के बाद बच्चे के परिजनों ने जब उसकी तलाश शुरू की और जंगल की ओर पहुंचे, तो उन्हें खून से लथपथ शव मिला। यह दृश्य देख पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई। परिजनों की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची, शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया और मामले की जांच शुरू की गई।
टोना-टोटका का शक और हत्या का आरोप
जांच के दौरान पुलिस के सामने जो सबसे चौंकाने वाली बात आई, वह यह थी कि हत्या के पीछे कोई पुरानी रंजिश या संपत्ति विवाद नहीं, बल्कि अंधविश्वास था। बताया जा रहा है कि आरोपियों में से एक को यह शक था कि मृतक बच्चे के परिवार ने उसके घर में हुई एक मौत या बीमारी के लिए टोना-टोटका किया है। इसी शक और बदले की भावना में उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर इस मासूम को निशाना बनाया।
पुलिस पूछताछ में दोनों आरोपियों ने अपराध कबूल कर लिया है। पुलिस का कहना है कि यह एक सुनियोजित हत्या थी, जिसमें बच्चे की उम्र और मासूमियत का भी कोई लिहाज नहीं रखा गया।
पुलिस की कार्रवाई और कानूनी पहलू
मारंगहदा थाना पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। उनके खिलाफ हत्या सहित अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया है और आगे की जांच जारी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर चार्जशीट तैयार की जा रही है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अदालत में आरोप साबित होते हैं, तो आरोपियों को उम्रकैद या उससे भी कठोर सजा हो सकती है। यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पीड़ित एक नाबालिग था और अपराध पूरी तरह से अंधविश्वास से प्रेरित था।
गांव में डर और आक्रोश का माहौल
घटना के बाद गांव में भय और आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अब भी अंधविश्वास के कारण खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मृतक के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका कहना है कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि टोना-टोटका जैसे आरोप में उनका बच्चा जान से हाथ धो बैठेगा।
कई सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा और सुरक्षा दी जाए, ताकि वे किसी भी तरह के दबाव या प्रतिशोध का शिकार न हों।
झारखंड में अंधविश्वास: एक पुरानी समस्या
यह पहली बार नहीं है जब झारखंड में टोना-टोटका के शक में किसी की जान गई हो। राज्य के कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में आज भी डायन-बिसाही, झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र जैसी कुप्रथाएँ गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। बीते वर्षों में महिलाओं, बुजुर्गों और अब बच्चों तक को इन अंधविश्वासों का शिकार बनते देखा गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, शिक्षा की कमी, गरीबी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और सामाजिक जागरूकता की कमी ऐसे अंधविश्वासों को बढ़ावा देती है। जब बीमारी या किसी की मौत का कारण समझ में नहीं आता, तो लोग वैज्ञानिक सोच की बजाय टोना-टोटका जैसे अंधविश्वासों का सहारा लेने लगते हैं।
सरकार और समाज की जिम्मेदारी
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक निर्दोष लोग अंधविश्वास की बलि चढ़ते रहेंगे। सरकार ने भले ही डायन-प्रथा और टोना-टोटका के खिलाफ कानून बनाए हों, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन की कमी साफ नजर आती है।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि केवल कानून बनाना काफी नहीं है। गांव-गांव तक शिक्षा, स्वास्थ्य और वैज्ञानिक सोच को पहुंचाना जरूरी है। पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान, स्कूलों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित शिक्षा और स्थानीय नेताओं की सक्रिय भूमिका से ही ऐसी घटनाओं पर रोक लग सकती है।
मीडिया और प्रशासन की भूमिका
मीडिया की जिम्मेदारी भी ऐसे मामलों में बेहद अहम हो जाती है। सही तथ्यों के साथ घटनाओं को सामने लाना, अंधविश्वास के दुष्परिणामों को उजागर करना और लोगों को जागरूक करना समय की मांग है। वहीं, प्रशासन को भी चाहिए कि वह संवेदनशील इलाकों की पहचान कर वहां विशेष अभियान चलाए।
निष्कर्ष
खूंटी में सात वर्षीय मासूम की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यह घटना दिखाती है कि अंधविश्वास आज भी कितना खतरनाक है और किस तरह निर्दोष जिंदगियों को निगल रहा है। जरूरत है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर ऐसे कुप्रथाओं के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें। तभी यह सुनिश्चित हो सकेगा कि भविष्य में कोई और बच्चा टोना-टोटका जैसे अंधविश्वास का शिकार न बने और झारखंड सचमुच सुरक्षित और जागरूक समाज की ओर बढ़ सके।




