झारखंड के सरांडा जंगल में एक बार फिर नक्सल विरोधी अभियान के दौरान सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई है। यह मुठभेड़ पश्चिमी सिंहभूम जिले के दुर्गम और घने जंगलों में गुरुवार तड़के उस समय हुई, जब सुरक्षाबलों की संयुक्त टीम नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना पर सर्च ऑपरेशन चला रही थी। इस मुठभेड़ में कई नक्सलियों के मारे जाने की खबर है, हालांकि उनकी संख्या और पहचान को लेकर आधिकारिक पुष्टि अभी की जानी बाकी है।
खुफिया सूचना के आधार पर चला संयुक्त अभियान
सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों को सरांडा के जंगलों में नक्सलियों के एक सक्रिय दस्ते के छिपे होने की पुख्ता जानकारी मिली थी। इसी के आधार पर CRPF, कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस की संयुक्त टीम ने सर्च ऑपरेशन की योजना बनाई। ऑपरेशन को पूरी गोपनीयता के साथ अंजाम दिया गया ताकि नक्सलियों को इसकी भनक न लगे।
गुरुवार सुबह जैसे ही सुरक्षाबल संदिग्ध इलाके में आगे बढ़े, जंगल में छिपे नक्सलियों ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद दोनों ओर से भारी फायरिंग होने लगी। जंगल की भौगोलिक स्थिति और घना पेड़-पौधों का आवरण मुठभेड़ को और भी चुनौतीपूर्ण बना रहा।
लंबे समय तक चली गोलीबारी
बताया जा रहा है कि मुठभेड़ कई घंटों तक चली। सुरक्षाबलों ने पूरी सतर्कता के साथ जवाबी कार्रवाई की और नक्सलियों को चारों ओर से घेरने की कोशिश की। इस दौरान नक्सली लगातार अपनी पोजिशन बदलते रहे, लेकिन सुरक्षाबलों की रणनीतिक घेराबंदी के कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा।
प्राथमिक जानकारी के अनुसार, इस मुठभेड़ में कई नक्सली ढेर हो गए, जबकि कुछ अन्य जंगल की आड़ लेकर फरार होने में सफल रहे।
हथियार और नक्सली सामग्री बरामद
मुठभेड़ के बाद इलाके में सघन तलाशी अभियान चलाया गया। इस दौरान सुरक्षाबलों ने घटनास्थल से आधुनिक हथियार, कारतूस, विस्फोटक सामग्री, नक्सली साहित्य और दैनिक उपयोग का सामान बरामद किया है। अधिकारियों का कहना है कि बरामद सामग्री से स्पष्ट होता है कि नक्सली लंबे समय से इस इलाके में ठिकाना बनाकर सक्रिय थे।
सुरक्षाबलों को आशंका है कि फरार नक्सली आसपास के जंगलों में छिपे हो सकते हैं, इसलिए ऑपरेशन अभी भी जारी है। ड्रोन और अन्य तकनीकी संसाधनों की मदद से इलाके की निगरानी की जा रही है।
सरांडा जंगल: नक्सलियों का पुराना गढ़
सरांडा जंगल को नक्सलियों का गढ़ माना जाता रहा है। यह इलाका न केवल घना और दुर्गम है, बल्कि झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से सटा होने के कारण नक्सलियों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
पिछले कई वर्षों से सुरक्षा एजेंसियां इस क्षेत्र में नक्सल नेटवर्क को तोड़ने के लिए लगातार अभियान चला रही हैं। इसके बावजूद नक्सली छोटे-छोटे दस्तों में बंटकर जंगलों में छिप जाते हैं और मौका मिलने पर हमले करते हैं।
नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता
सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि यह मुठभेड़ नक्सल विरोधी अभियान के लिहाज से एक बड़ी सफलता है। लगातार दबाव और खुफिया तंत्र की मजबूती के कारण नक्सलियों की गतिविधियों पर अंकुश लगा है।
अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाइयों से नक्सलियों का मनोबल टूटता है और उनके संगठनात्मक ढांचे को भी नुकसान पहुंचता है।
स्थानीय इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई गई
मुठभेड़ के बाद चाईबासा और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। संवेदनशील गांवों में अतिरिक्त बलों की तैनाती की गई है और आने-जाने वाले रास्तों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को देने की अपील की है।
राज्य सरकार की रणनीति
झारखंड सरकार और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां राज्य को नक्सल मुक्त बनाने के लक्ष्य पर लगातार काम कर रही हैं। इसके तहत न केवल सैन्य अभियान चलाए जा रहे हैं, बल्कि विकास योजनाओं के माध्यम से भी प्रभावित इलाकों में बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है।
सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी योजनाओं के जरिए स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि नक्सली विचारधारा के प्रभाव को खत्म किया जा सके।
आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
फिलहाल मुठभेड़ में मारे गए नक्सलियों की संख्या, उनकी पहचान और किसी बड़े नक्सली नेता के शामिल होने को लेकर आधिकारिक बयान का इंतजार है। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि सर्च ऑपरेशन पूरा होने के बाद ही विस्तृत जानकारी साझा की जाएगी।


