रिम्स CID जांच : झारखंड की राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है। इस बार मामला कथित फर्जी MBBS नामांकन और करोड़ों रुपये के टेंडर आवंटन में अनियमितताओं से जुड़ा है। इन आरोपों की जांच अपराध अनुसंधान विभाग (CID) द्वारा की जा रही है। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे कई अहम दस्तावेज और नए तथ्य सामने आ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में कई बड़े अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
रिम्स राज्य का सबसे बड़ा सरकारी मेडिकल संस्थान है। ऐसे संस्थान में यदि प्रवेश प्रक्रिया और टेंडर व्यवस्था में अनियमितता के आरोप लगते हैं तो इसका असर न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था बल्कि चिकित्सा शिक्षा की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है। यही कारण है कि इस मामले पर पूरे झारखंड की नजर बनी हुई है।
क्या है पूरा मामला?
CID फिलहाल दो प्रमुख मामलों की समानांतर जांच कर रही है। पहला मामला वर्ष 2025 में MBBS पाठ्यक्रम में हुए कथित फर्जी नामांकन से जुड़ा है। आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों ने फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल सीट हासिल की। वहीं दूसरा मामला रिम्स में करोड़ों रुपये के टेंडर आवंटन में नियमों की अनदेखी और मनमानी से संबंधित है।
बताया जा रहा है कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान नियमों में बदलाव कर कुछ कंपनियों या एजेंसियों को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह झारखंड के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सबसे बड़े घोटालों में से एक माना जाएगा।
CID ने जब्त किए महत्वपूर्ण दस्तावेज
जांच के दौरान CID की टीम ने रिम्स के कई विभागों से प्रशासनिक रिकॉर्ड, फाइलें, टेंडर दस्तावेज और नामांकन से जुड़े रिकॉर्ड अपने कब्जे में लिए हैं। इन दस्तावेजों की तकनीकी और कानूनी जांच की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कहीं पूरी प्रक्रिया किसी संगठित नेटवर्क के माध्यम से संचालित तो नहीं हुई। यदि दस्तावेजों में किसी प्रकार की गड़बड़ी या साजिश के प्रमाण मिलते हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ का दायरा और बढ़ सकता है।
फर्जी नामांकन पर विशेष फोकस
CID उन छात्रों के प्रवेश की भी जांच कर रही है जिनके खिलाफ फर्जी जाति, आवासीय या अन्य प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने के आरोप लगे हैं।
जांच एजेंसी यह भी पता लगा रही है कि प्रवेश प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया और यदि कोई फर्जी प्रमाणपत्र स्वीकार किया गया तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत साबित होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
करोड़ों के टेंडर पर भी उठे सवाल
रिम्स में सफाई, सुरक्षा, उपकरण खरीद और अन्य सेवाओं से जुड़े कई बड़े टेंडरों की भी CID जांच कर रही है। आरोप है कि निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता का पालन नहीं किया गया और कुछ कंपनियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से शर्तों में बदलाव किया गया।
टेंडर प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं के कारण सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है। यदि जांच में वित्तीय गड़बड़ी के प्रमाण मिलते हैं तो आर्थिक अपराध से जुड़े पहलुओं की भी अलग से जांच हो सकती है।
कई बड़े नाम जांच के दायरे में
सूत्रों के मुताबिक, CID की जांच केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। कई पूर्व और वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में है। हालांकि जांच एजेंसी ने अभी तक किसी का नाम आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किया है।
जांच पूरी होने के बाद संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों से विस्तृत पूछताछ की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर नए सिरे से प्राथमिकी दर्ज होने की भी संभावना जताई जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग की बढ़ी चिंता
रिम्स झारखंड का प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल है, जहां राज्य के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे संस्थान में यदि प्रवेश और टेंडर जैसी प्रक्रियाओं में अनियमितता सामने आती है तो इससे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की छवि प्रभावित होती है।
राज्य सरकार ने पहले भी स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा। इसी नीति के तहत CID को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
क्या हो सकती है आगे की कार्रवाई?
जांच पूरी होने के बाद CID अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगी। यदि रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों और अन्य दोषियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है। साथ ही विभागीय कार्रवाई, निलंबन और अन्य कानूनी कदम भी उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच चिकित्सा शिक्षा और सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। इससे भविष्य में ऐसी अनियमितताओं पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
रिम्स में कथित फर्जी नामांकन और करोड़ों रुपये के टेंडर घोटाले की CID जांच झारखंड की सबसे महत्वपूर्ण जांचों में से एक बनती जा रही है। दस्तावेजों की जांच, रिकॉर्ड की पड़ताल और संभावित पूछताछ के बाद आने वाले दिनों में कई अहम खुलासे हो सकते हैं। फिलहाल पूरे राज्य की नजर इस जांच पर टिकी हुई है। अंतिम निष्कर्ष CID की विस्तृत जांच और सरकार की आधिकारिक कार्रवाई के बाद ही सामने आएगा, लेकिन इतना तय है कि यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।







