रांची विश्वविद्यालय पीजी नामांकन : झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। रांची विश्वविद्यालय (RU) के स्नातकोत्तर (पीजी) सत्र 2025-27 में इस बार बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गई हैं। विश्वविद्यालय के आंकड़ों के अनुसार पीजी के विभिन्न विभागों में कुल 1462 विद्यार्थियों ने आवेदन कर शुल्क जमा किया, लेकिन इनमें से केवल 628 विद्यार्थियों ने अंतिम रूप से नामांकन कराया। यानी आवेदन करने वाले आधे से भी कम छात्र ही विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने पहुंचे। यह स्थिति विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ उच्च शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार पीजी सत्र की नियमित कक्षाएं 20 जुलाई से शुरू होंगी। हालांकि, नामांकन का कम आंकड़ा यह संकेत दे रहा है कि विद्यार्थियों की प्राथमिकताओं में बदलाव आया है और पारंपरिक विषयों के प्रति रुचि लगातार घट रही है।
कई विभागों में बेहद कम रहा नामांकन
रांची विश्वविद्यालय के कई विभाग ऐसे हैं, जहां इस बार छात्रों की संख्या बेहद कम रही। कुछ विभागों में तो नामांकन एकल अंक तक सिमट गया।
सबसे कम नामांकन वाले विषयों में शामिल हैं—
- खड़िया – 1 छात्र
- समाजशास्त्र – 2 छात्र
- कुरमाली – 3 छात्र
- पंचपरगनिया – 4 छात्र
- दर्शनशास्त्र – 4 छात्र
- बांग्ला – 7 छात्र
- भूगर्भशास्त्र – 7 छात्र
- संस्कृत – 8 छात्र
इन विभागों में सीटों का बड़ा हिस्सा खाली रह गया है। इससे भविष्य में इन विषयों के संचालन, शिक्षकों की उपलब्धता और विभागीय संसाधनों के बेहतर उपयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
इन विषयों में छात्रों की रही सबसे अधिक रुचि
हालांकि कुछ विषय ऐसे भी रहे, जहां अपेक्षाकृत बेहतर नामांकन दर्ज किया गया। रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाले विषयों में छात्रों ने अधिक रुचि दिखाई।
सबसे अधिक नामांकन वाले विषय इस प्रकार हैं—
- अंग्रेजी – 61 छात्र
- गणित – 51 छात्र
- हिंदी – 41 छात्र
- कॉमर्स – 41 छात्र
- भूगोल – 41 छात्र
- जंतु विज्ञान – 33 छात्र
- अर्थशास्त्र – 30 छात्र
- इतिहास – 29 छात्र
- मनोविज्ञान – 28 छात्र
- नागपुरी – 27 छात्र
- भौतिकी – 27 छात्र
इसके बावजूद विश्वविद्यालय की कुल उपलब्ध सीटों की तुलना में यह संख्या काफी कम मानी जा रही है।
आखिर क्यों खाली रह गईं इतनी सीटें?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं।
सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत लागू नई शिक्षा व्यवस्था को माना जा रहा है। चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कई छात्र अब एक वर्षीय पीजी कार्यक्रम या अन्य वैकल्पिक कोर्स की ओर रुख कर रहे हैं।
इसके अलावा कई छात्र केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय संस्थानों और दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेना पसंद कर रहे हैं। समय पर शैक्षणिक सत्र नहीं चलना भी विद्यार्थियों के निर्णय को प्रभावित करता है।
बदल रही है छात्रों की सोच
पिछले कुछ वर्षों में छात्रों की पढ़ाई को लेकर सोच में बड़ा बदलाव आया है। अब अधिकांश विद्यार्थी ऐसे कोर्स चुनना चाहते हैं जिनसे उन्हें जल्दी रोजगार मिल सके या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में फायदा हो।
इसी वजह से पारंपरिक विषयों की तुलना में व्यावसायिक, तकनीकी और कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की मांग तेजी से बढ़ी है। यही बदलाव रांची विश्वविद्यालय के पीजी नामांकन में भी साफ दिखाई दे रहा है।
विश्वविद्यालय के सामने बढ़ी चुनौती
नामांकन में आई गिरावट विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए कई नई चुनौतियां लेकर आई है। यदि लगातार सीटें खाली रहती हैं तो भविष्य में कुछ विभागों के संचालन, बजट, शिक्षकों की नियुक्ति और शैक्षणिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालय को विद्यार्थियों की जरूरतों के अनुसार नए और रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे। साथ ही उद्योगों, शोध संस्थानों और निजी कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ानी होगी ताकि छात्रों को बेहतर करियर विकल्प मिल सकें।
क्या हो सकते हैं समाधान?
रांची विश्वविद्यालय यदि पीजी में नामांकन बढ़ाना चाहता है तो उसे कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे—
- समय पर प्रवेश प्रक्रिया और शैक्षणिक सत्र पूरा करना।
- रोजगार आधारित और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े नए पाठ्यक्रम शुरू करना।
- छात्रों को इंटर्नशिप और प्लेसमेंट की बेहतर सुविधा देना।
- रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देना।
- ग्रामीण और दूरदराज के विद्यार्थियों के लिए जागरूकता अभियान चलाना।
- डिजिटल माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया को और आसान बनाना।
झारखंड की उच्च शिक्षा के लिए संकेत
रांची विश्वविद्यालय राज्य का सबसे बड़ा और सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। यहां होने वाले नामांकन के आंकड़े पूरे झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था का संकेत माने जाते हैं। ऐसे में पीजी की बड़ी संख्या में सीटें खाली रहना केवल विश्वविद्यालय की समस्या नहीं, बल्कि राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर संकेत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पाठ्यक्रमों को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में पारंपरिक विषयों में छात्रों की संख्या और कम हो सकती है।
निष्कर्ष
रांची विश्वविद्यालय के पीजी सत्र 2025-27 में 1462 आवेदनों के मुकाबले केवल 628 छात्रों का नामांकन होना उच्च शिक्षा के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। एक ओर कुछ विषयों में छात्रों की अच्छी रुचि बनी हुई है, वहीं कई पारंपरिक विभागों में सीटें लगभग खाली हैं। अब विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती छात्रों का विश्वास बढ़ाने, रोजगारपरक शिक्षा को बढ़ावा देने और समय पर शैक्षणिक सत्र संचालित करने की है। यदि इन मुद्दों पर प्रभावी कदम उठाए जाते हैं, तो भविष्य में नामांकन की स्थिति में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।







