रांची। झारखंड में लगातार बढ़ रहे मानव-हाथी संघर्ष का मुद्दा बजट सत्र के दौरान झारखंड विधानसभा में जोर-शोर से उठा। सदन के दूसरे दिन विधायकों ने हाथियों के हमलों से हो रही जान-माल की क्षति पर गहरी चिंता जताते हुए सरकार से ठोस और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की। यह मुद्दा न केवल वन क्षेत्रों तक सीमित रहा, बल्कि ग्रामीण आबादी की सुरक्षा और आजीविका से भी जुड़ा हुआ बताया गया।
ग्रामीण इलाकों में बढ़ता खतरा
सदन में बताया गया कि राज्य के कई जिलों में हाथियों के झुंड रिहायशी इलाकों में प्रवेश कर रहे हैं। इससे खेतों की फसलें बर्बाद हो रही हैं, मकान क्षतिग्रस्त हो रहे हैं और कई मामलों में लोगों की जान तक चली गई है। विधायकों ने कहा कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित हैं, जिनकी निर्भरता खेती और दैनिक मजदूरी पर है। हाथियों के अचानक हमलों से न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि भय का माहौल भी बन गया है।
मुआवज़े में देरी पर सवाल
विपक्षी सदस्यों ने सरकार से पूछा कि हाथियों के हमलों में मृतकों के परिजनों और प्रभावित परिवारों को मिलने वाला मुआवज़ा समय पर क्यों नहीं पहुंचता। कई मामलों में लंबी जांच प्रक्रिया और कागजी औपचारिकताओं के कारण पीड़ितों को महीनों इंतजार करना पड़ता है। विधायकों ने मांग की कि मुआवज़ा प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और समय सीमा तय कर भुगतान सुनिश्चित किया जाए, ताकि संकट की घड़ी में प्रभावित परिवारों को तुरंत राहत मिल सके।
सरकार का पक्ष और आश्वासन
सरकार की ओर से सदन में बताया गया कि मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा रहा है। वन विभाग द्वारा संवेदनशील क्षेत्रों में क्विक रिस्पॉन्स टीम, निगरानी दल और हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इसके साथ ही ग्रामीणों को जागरूक करने, रात के समय सावधानी बरतने और सामुदायिक स्तर पर सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार ने यह भी कहा कि मुआवज़े के मामलों में देरी को गंभीरता से लिया जा रहा है और प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं।
दीर्घकालिक समाधान की जरूरत
सदन में यह भी चर्चा हुई कि केवल तात्कालिक राहत से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। विधायकों ने हाथियों के प्राकृतिक गलियारों (एलीफेंट कॉरिडोर) की पहचान और संरक्षण, जंगलों में पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था और अवैध खनन व अतिक्रमण पर सख्ती की मांग की। उनका कहना था कि जब तक हाथियों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं कम नहीं होंगी।
निष्कर्ष
झारखंड विधानसभा में उठी यह बहस साफ संकेत देती है कि हाथियों के हमले अब एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुके हैं। सरकार और विपक्ष दोनों इस बात पर सहमत दिखे कि प्रभावित लोगों की सुरक्षा और राहत सर्वोपरि है। अब देखना यह होगा कि सदन में दिए गए आश्वासन जमीनी स्तर पर कितनी तेजी और प्रभावशीलता से लागू होते हैं।
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