हूल दिवस 2026 : हूल दिवस 2026 के अवसर पर झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने रांची स्थित लोक भवन में हूल क्रांति के महानायक सिदो-कान्हू के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान उन्होंने कहा कि हूल क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासी समाज के अदम्य साहस और स्वाभिमान को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
राज्यपाल ने कहा कि सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो सहित हूल आंदोलन के सभी वीर सेनानियों ने अन्याय, शोषण और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्ष किया। उनका त्याग, बलिदान और राष्ट्रप्रेम आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
हूल दिवस केवल स्मरण का नहीं, संकल्प का भी दिन
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने अपने संदेश में कहा कि हूल दिवस केवल शहीदों को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों पर चलने और समाज में न्याय, समानता तथा स्वाभिमान की भावना को मजबूत करने का संकल्प लेने का दिन भी है।
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को अपने इतिहास और उन वीर सेनानियों के संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए, जिन्होंने देश और समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
क्या है हूल क्रांति?
हूल क्रांति, जिसे संथाल हूल भी कहा जाता है, वर्ष 1855 में अंग्रेजी शासन, महाजनी प्रथा और जमींदारी शोषण के खिलाफ शुरू हुआ एक ऐतिहासिक जनविद्रोह था। इसकी अगुवाई सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने अपने भाइयों चांद और भैरव के साथ मिलकर की थी।
30 जून 1855 को साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव से इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी। हजारों संथाल आदिवासी इस आंदोलन में शामिल हुए और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। हालांकि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन इस आंदोलन ने पूरे देश में स्वतंत्रता की चेतना को नई दिशा दी।
क्यों मनाया जाता है हूल दिवस?
हर वर्ष 30 जून को झारखंड सहित देश के कई राज्यों में हूल दिवस मनाया जाता है। इस दिन सिदो-कान्हू और हूल आंदोलन के सभी अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
झारखंड सरकार, विभिन्न सामाजिक संगठन, शैक्षणिक संस्थान और राजनीतिक दल इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को आदिवासी इतिहास, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान से परिचित कराया जाता है।
आदिवासी स्वाभिमान का प्रतीक है हूल आंदोलन
इतिहासकारों के अनुसार हूल आंदोलन केवल अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह नहीं था, बल्कि यह आदिवासी समाज के सम्मान, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और आर्थिक शोषण के विरुद्ध एक व्यापक जनआंदोलन था।
सिदो-कान्हू ने लोगों को संगठित कर यह संदेश दिया कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करना ही समाज की सबसे बड़ी ताकत है। यही कारण है कि आज भी हूल दिवस आदिवासी अस्मिता और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है।
लोक भवन में हुआ श्रद्धांजलि कार्यक्रम
रांची स्थित लोक भवन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने सिदो-कान्हू के चित्र पर पुष्प अर्पित किए और उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि हूल आंदोलन के वीर सेनानियों का बलिदान भारत के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।
राज्यपाल ने यह भी कहा कि देश के विकास और सामाजिक समरसता के लिए हमें उन महान स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए, जिन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा।
झारखंड के लिए हूल दिवस का विशेष महत्व
झारखंड की पहचान उसकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक आंदोलनों से जुड़ी रही है। हूल दिवस राज्य के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसरों में से एक माना जाता है।
इस दिन राज्यभर के रांची, दुमका, साहिबगंज, पाकुड़, जामताड़ा, गोड्डा और अन्य जिलों में श्रद्धांजलि सभाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगोष्ठियां और जनजागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य समाज को स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान से अवगत कराना और युवाओं में राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करना है।
निष्कर्ष
हूल दिवस केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की अमर गाथा है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार द्वारा सिदो-कान्हू और हूल आंदोलन के सभी वीर शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि इस बात का संदेश देती है कि राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज आवश्यकता है कि उनके आदर्शों को अपनाते हुए न्याय, समानता और सामाजिक एकता के मूल्यों को आगे बढ़ाया जाए।







