बिहार के तीन कलाकार सम्मानित : बिहार की समृद्ध कला और सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर बड़ी पहचान मिली है। नई दिल्ली में आयोजित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिहार के तीन प्रमुख कलाकारों को सम्मानित किया। सम्मान पाने वाले कलाकारों में रंगमंच से जुड़े सुरेश कुमार हज्जू, मैथिली रंगमंच के वरिष्ठ निर्देशक शिव नारायण झा उर्फ कुणाल और लोक वाद्य कलाकार महेन्द्र राम शामिल हैं।
इन कलाकारों को वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत, नृत्य, रंगमंच और प्रदर्शन कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। यह उपलब्धि न केवल तीनों कलाकारों के लिए बल्कि पूरे बिहार के कला जगत के लिए गौरव का विषय है।
राष्ट्रपति ने कलाकारों को प्रदान किया सम्मान
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देशभर के कलाकारों को सम्मानित किया। संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न कला विधाओं से जुड़े कलाकारों को पुरस्कार प्रदान किए गए।
बिहार के तीन कलाकारों को भी इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया। कलाकारों को ताम्रपत्र, प्रशस्ति पत्र और एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई। लंबे समय से कला के क्षेत्र में सक्रिय इन कलाकारों के लिए यह सम्मान उनकी दशकों की साधना की राष्ट्रीय स्वीकृति है।
सुरेश कुमार हज्जू का रंगमंच में महत्वपूर्ण योगदान
बिहार के रंगमंच क्षेत्र में सुरेश कुमार हज्जू का नाम लंबे समय से सक्रिय कलाकारों में लिया जाता है। अभिनेता और निर्देशक के रूप में उन्होंने रंगमंच को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
रंगमंच को समाज का आईना माना जाता है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाने का प्रभावी माध्यम भी है। बिहार जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में रंगमंच की अपनी विशिष्ट परंपरा रही है।
सुरेश कुमार हज्जू ने कई दशकों तक इस परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। उनके सम्मान से बिहार के रंगमंच से जुड़े कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
शिव नारायण झा उर्फ कुणाल को मैथिली रंगमंच के लिए सम्मान
बिहार से सम्मानित होने वाले दूसरे कलाकार शिव नारायण झा उर्फ कुणाल हैं। वे मैथिली रंगमंच के वरिष्ठ निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं।
मैथिली भाषा और मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा बिहार की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मैथिली साहित्य, लोकगीत, नाटक और रंगमंच ने देश की सांस्कृतिक विविधता में अहम योगदान दिया है।
मैथिली रंगमंच को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना क्षेत्रीय भाषाओं और लोक संस्कृति के संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। शिव नारायण झा का सम्मान यह संदेश देता है कि क्षेत्रीय भाषा में लंबे समय तक किया गया रचनात्मक कार्य राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल कर सकता है।
महेन्द्र राम ने लोक वाद्य परंपरा को दिया योगदान
बिहार के तीसरे सम्मानित कलाकार महेन्द्र राम हैं, जिन्होंने लोक वाद्य के क्षेत्र में लंबे समय तक योगदान दिया है।
भारत में लोक संगीत की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की अपनी विशेष पहचान है। बिहार में भी लोक संगीत और पारंपरिक वाद्य स्थानीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।
आधुनिक संगीत और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक लोक वाद्यों को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में लोक कलाकारों को राष्ट्रीय सम्मान मिलना इस कला विधा के संरक्षण के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।
चार से पांच दशक की कला साधना को मिली पहचान
बिहार के इन तीनों कलाकारों ने करीब चार से पांच दशकों तक कला के क्षेत्र में योगदान दिया है। किसी कला विधा में इतने लंबे समय तक सक्रिय रहना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
इन कलाकारों ने सिर्फ अपनी कला का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि कला परंपराओं को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी काम किया। यही वजह है कि उनका सम्मान बिहार की सांस्कृतिक विरासत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बिहार की कला और संस्कृति के लिए बड़ा सम्मान
बिहार को आमतौर पर ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है। लेकिन राज्य की सांस्कृतिक पहचान इससे कहीं व्यापक है। मैथिली, भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं के साथ-साथ लोकगीत, लोकनृत्य, रंगमंच और पारंपरिक संगीत बिहार की सांस्कृतिक विविधता को मजबूत बनाते हैं।
राष्ट्रपति के हाथों बिहार के तीन कलाकारों का सम्मान इस बात को रेखांकित करता है कि राज्य की क्षेत्रीय कला विधाओं का राष्ट्रीय महत्व है।
यह सम्मान स्थानीय कलाकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। खासकर उन युवाओं के लिए, जो पारंपरिक कला और आधुनिक करियर विकल्पों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
युवा कलाकारों को मिलेगा प्रोत्साहन
आज के डिजिटल दौर में मनोरंजन के तरीके तेजी से बदल रहे हैं। सोशल मीडिया, ओटीटी और डिजिटल कंटेंट के कारण पारंपरिक रंगमंच तथा लोक कलाओं के सामने नई चुनौतियां हैं।
ऐसे समय में वरिष्ठ कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने से युवा कलाकारों को अपनी संस्कृति और कला परंपराओं से जुड़ने की प्रेरणा मिल सकती है। इससे बिहार की लोक और क्षेत्रीय कला को नए दर्शक भी मिल सकते हैं।
राष्ट्रीय मंच पर मजबूत हुई बिहार की पहचान
राष्ट्रपति द्वारा बिहार के तीन कलाकारों को सम्मानित किए जाने से राज्य की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर मजबूती मिली है। यह उपलब्धि बताती है कि बिहार की कला परंपरा आज भी जीवंत है और देश के सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
सुरेश कुमार हज्जू, शिव नारायण झा उर्फ कुणाल और महेन्द्र राम का सम्मान उन हजारों कलाकारों के लिए भी उम्मीद और प्रेरणा का संदेश है, जो वर्षों से अपनी कला को बचाने और आगे बढ़ाने में जुटे हैं।
निष्कर्ष
बिहार के तीन कलाकारों को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जाना राज्य के लिए गौरव का अवसर है। रंगमंच, मैथिली रंगमंच और लोक वाद्य के क्षेत्र में दशकों तक योगदान देने वाले इन कलाकारों को मिली राष्ट्रीय पहचान बिहार की सांस्कृतिक विरासत के महत्व को दर्शाती है।
यह सम्मान केवल तीन कलाकारों की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि बिहार की कला, लोक संस्कृति, क्षेत्रीय भाषाओं और रंगमंच परंपरा का राष्ट्रीय सम्मान भी है। आने वाले समय में ऐसे सम्मान युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।







