झारखंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट : झारखंड के हजारों गंभीर रक्त रोगियों के लिए राहत की खबर अभी भी इंतजार में है। राज्य में पहली बार बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना वित्तीय बाधाओं के कारण अधर में लटक गई है। स्वास्थ्य विभाग ने रांची में इस अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधा को शुरू करने की योजना बनाई थी, लेकिन परियोजना को पूरा करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त 4 करोड़ रुपये की व्यवस्था नहीं हो पाने से इसका सपना फिलहाल अधूरा रह गया है।
बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट शुरू होने से थैलेसीमिया, ब्लड कैंसर, एप्लास्टिक एनीमिया, सिकल सेल एनीमिया और अन्य गंभीर रक्त संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को राज्य में ही इलाज की सुविधा मिल सकती थी। वर्तमान में झारखंड के मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई, वेल्लोर, कोलकाता और अन्य बड़े चिकित्सा केंद्रों का रुख करना पड़ता है, जिससे आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का बोझ बढ़ जाता है।
क्या है बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट?
बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक विशेष चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसमें मरीज के खराब या रोगग्रस्त बोन मैरो को स्वस्थ स्टेम सेल से प्रतिस्थापित किया जाता है। यह उपचार विशेष रूप से ब्लड कैंसर, ल्यूकेमिया, लिम्फोमा, थैलेसीमिया और अन्य गंभीर रक्त रोगों के इलाज में उपयोगी माना जाता है।
इस प्रक्रिया के लिए अत्याधुनिक लैब, संक्रमण मुक्त वार्ड, विशेष उपकरण और प्रशिक्षित डॉक्टरों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि इसकी स्थापना और संचालन पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
झारखंड में क्यों जरूरी है यह सुविधा?
झारखंड में बड़ी संख्या में थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया के मरीज पाए जाते हैं। राज्य के कई आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में इन बीमारियों के मामले लगातार सामने आते हैं। ऐसे मरीजों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट जीवनरक्षक उपचार साबित हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य में यह सुविधा उपलब्ध हो जाती है तो मरीजों को दूसरे राज्यों में इलाज कराने की मजबूरी खत्म होगी। साथ ही इलाज की लागत भी काफी कम हो जाएगी। वर्तमान में एक बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर 15 लाख से 30 लाख रुपये तक खर्च आ सकता है, जो अधिकांश परिवारों की पहुंच से बाहर है।
रांची में प्रस्तावित थी पहली यूनिट
राज्य सरकार ने रांची में पहली बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट स्थापित करने का निर्णय लिया था। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग ने विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी तैयार करवाई थी। शुरुआती अनुमान के अनुसार परियोजना की लागत लगभग 7 करोड़ रुपये रखी गई थी, लेकिन तकनीकी आवश्यकताओं और आधुनिक उपकरणों की जरूरत को देखते हुए लागत बढ़कर 11 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गई।
यही अतिरिक्त लागत अब परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। विभाग को लगभग 4 करोड़ रुपये अतिरिक्त चाहिए, जिसके बिना निर्माण और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
टेंडर प्रक्रिया भी बनी बाधा
स्वास्थ्य विभाग ने इस परियोजना के लिए टेंडर जारी किया था, लेकिन लागत बढ़ने के कारण प्रक्रिया में बदलाव करना पड़ा। इसके बाद री-टेंडरिंग का फैसला लिया गया, जिससे प्रोजेक्ट की समयसीमा और आगे बढ़ गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि हर महीने की देरी मरीजों के लिए मुश्किलें बढ़ा रही है। कई ऐसे मरीज हैं जिन्हें समय पर बोन मैरो ट्रांसप्लांट नहीं मिलने के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
मरीजों को हो रही भारी परेशानी
झारखंड के मरीजों को वर्तमान में इलाज के लिए दूसरे राज्यों के अस्पतालों में जाना पड़ता है। इससे यात्रा, रहने और इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह खर्च वहन करना बेहद कठिन होता है।
कई बार आर्थिक तंगी के कारण मरीज इलाज बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सामाजिक संगठनों का कहना है कि राज्य में बीएमटी यूनिट स्थापित होने से हजारों परिवारों को राहत मिलेगी।
स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि होगी
विशेषज्ञों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट किसी भी राज्य की उन्नत स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रतीक मानी जाती है। यह सुविधा न केवल गंभीर बीमारियों के इलाज को बेहतर बनाती है, बल्कि राज्य के मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नई पहचान देती है।
रांची में यूनिट स्थापित होने से मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों को भी आधुनिक चिकित्सा तकनीकों का प्रशिक्षण मिलेगा। इससे झारखंड चिकित्सा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा सकेगा।
सरकार से बढ़ी उम्मीदें
राज्य सरकार लगातार स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने का दावा कर रही है। मेडिकल कॉलेजों के विस्तार, अस्पतालों के आधुनिकीकरण और नई चिकित्सा सेवाओं की शुरुआत के लिए कई योजनाएं चल रही हैं। ऐसे में मरीजों और उनके परिवारों को उम्मीद है कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट के लिए आवश्यक अतिरिक्त राशि जल्द स्वीकृत कर दी जाएगी।
यदि सरकार इस परियोजना को प्राथमिकता देते हुए वित्तीय बाधा दूर कर देती है, तो झारखंड के हजारों मरीजों को अपने ही राज्य में जीवनरक्षक उपचार मिल सकेगा।
निष्कर्ष
झारखंड में बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट की स्थापना केवल एक स्वास्थ्य परियोजना नहीं, बल्कि हजारों मरीजों की उम्मीदों से जुड़ा सपना है। फिलहाल 4 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आवश्यकता इस सपने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों, मरीजों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि सरकार जल्द निर्णय लेकर इस महत्वपूर्ण परियोजना को धरातल पर उतारे ताकि गंभीर रक्त रोगों से जूझ रहे मरीजों को समय पर और सुलभ इलाज मिल सके।







