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रांची में बोन मैरो ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे 60 बच्चे, परिजनों ने सरकार से पूछा- इलाज कब मिलेगा? | Jharkhand News | Bhaiyajii News |

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रांची बोन मैरो ट्रांसप्लांट : झारखंड की राजधानी रांची में गंभीर रक्त रोगों से पीड़ित करीब 60 बच्चे बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant-BMT) का इंतजार कर रहे हैं। इनमें थैलेसीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया और अन्य गंभीर रक्त संबंधी बीमारियों से जूझ रहे बच्चे शामिल हैं। इलाज की उम्मीद में वर्षों से अस्पतालों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहे परिजनों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। उनका कहना है कि राज्य में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की आधुनिक सुविधा शुरू करने के कई आश्वासन मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दे रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट कई गंभीर रक्त रोगों से पीड़ित बच्चों के लिए जीवनदान साबित हो सकता है। समय पर इलाज नहीं मिलने से बच्चों को बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है, जिससे संक्रमण, आर्थिक बोझ और शारीरिक जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में परिजनों ने सरकार से स्पष्ट जवाब और समयबद्ध कार्ययोजना की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

रांची सहित झारखंड के विभिन्न जिलों से आने वाले लगभग 60 बच्चे वर्तमान में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची में हैं। इनमें अधिकांश बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और राज्य के बाहर जाकर महंगा इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं।

परिजनों का कहना है कि—

  • बच्चों को नियमित रूप से रक्त चढ़ाना पड़ रहा है,
  • हर महीने हजारों रुपये इलाज पर खर्च हो रहे हैं,
  • कई बच्चों की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है,
  • राज्य में पर्याप्त बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा उपलब्ध नहीं है।

परिवारों का कहना है कि यदि समय पर ट्रांसप्लांट नहीं हुआ तो कई बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

बोन मैरो ट्रांसप्लांट क्या है?

बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक विशेष चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें रोगग्रस्त या क्षतिग्रस्त बोन मैरो को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदला जाता है।

यह उपचार मुख्य रूप से निम्न बीमारियों में किया जाता है—

  • थैलेसीमिया मेजर,
  • एप्लास्टिक एनीमिया,
  • ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर),
  • लिम्फोमा,
  • कुछ आनुवंशिक रक्त विकार।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई मरीजों के लिए यह उपचार स्थायी समाधान साबित होता है और उन्हें बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की सबसे बड़ी उम्मीद

झारखंड में बड़ी संख्या में बच्चे थैलेसीमिया जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी में शरीर पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं नहीं बना पाता।

इसके कारण—

  • हर 15 से 30 दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता है,
  • शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है,
  • हृदय और लीवर पर असर पड़ सकता है,
  • बच्चों की सामान्य वृद्धि प्रभावित होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट ऐसे बच्चों के लिए सामान्य जीवन की उम्मीद बन सकता है।

राज्य में क्यों जरूरी है BMT सेंटर?

वर्तमान में झारखंड के मरीजों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों का रुख करना पड़ता है।

इससे कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं—

  • लाखों रुपये का अतिरिक्त खर्च,
  • लंबे समय तक दूसरे शहर में रहना,
  • नौकरी और आय पर असर,
  • मानसिक तनाव,
  • इलाज में देरी।

यदि रांची में आधुनिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेंटर शुरू होता है तो हजारों मरीजों को सीधा लाभ मिल सकता है।

परिजनों की क्या मांग है?

बच्चों के परिजनों ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग से कई मांगें रखी हैं।

मुख्य मांगें—

  • जल्द से जल्द BMT सेंटर शुरू किया जाए,
  • प्रतीक्षा सूची में शामिल बच्चों का प्राथमिकता के आधार पर इलाज हो,
  • आर्थिक सहायता बढ़ाई जाए,
  • राज्य के बाहर इलाज कराने वालों को विशेष अनुदान मिले,
  • स्पष्ट कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए।

परिजनों का कहना है कि हर दिन की देरी बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती

झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं में लगातार सुधार हुआ है, लेकिन अत्याधुनिक उपचार सेवाओं की कमी अभी भी महसूस की जाती है।

विशेष रूप से—

  • बोन मैरो ट्रांसप्लांट,
  • ऑर्गन ट्रांसप्लांट,
  • एडवांस कैंसर ट्रीटमेंट,
  • दुर्लभ बीमारियों के उपचार

जैसी सुविधाओं का विस्तार अभी भी आवश्यक माना जा रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को अब सुपर स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक ध्यान देना होगा।

आर्थिक बोझ से टूट रहे परिवार

थैलेसीमिया और अन्य गंभीर रक्त रोगों से पीड़ित बच्चों के इलाज में हर महीने हजारों रुपये खर्च होते हैं।

परिवारों को—

  • बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है,
  • रक्त की व्यवस्था करनी पड़ती है,
  • दवाओं पर खर्च करना पड़ता है,
  • कई बार नौकरी छोड़नी पड़ती है।

ऐसे में आर्थिक सहायता और स्थानीय स्तर पर इलाज की सुविधा अत्यंत आवश्यक हो जाती है।

बच्चों की शिक्षा और भविष्य पर असर

लंबे समय तक गंभीर बीमारी से जूझने वाले बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।

इन बच्चों को—

  • स्कूल से अनुपस्थित रहना पड़ता है,
  • बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है,
  • सामाजिक गतिविधियों से दूर रहना पड़ता है,
  • मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर इलाज मिलने से बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।

विशेषज्ञों ने क्या कहा?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड में बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू करना समय की जरूरत है।

विशेषज्ञों के अनुसार—

  • इससे इलाज का खर्च कम होगा,
  • मरीजों को समय पर उपचार मिलेगा,
  • स्वास्थ्य ढांचा मजबूत होगा,
  • राज्य के बाहर निर्भरता कम होगी।

उन्होंने कहा कि आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में निवेश भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

स्वास्थ्य नीति पर उठे सवाल

यह मुद्दा राज्य की स्वास्थ्य नीति और बजट प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि—

  • गंभीर और दुर्लभ बीमारियों के लिए विशेष योजना होनी चाहिए,
  • बाल स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए,
  • ट्रांसप्लांट सेवाओं का विस्तार जरूरी है,
  • स्वास्थ्य अवसंरचना में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

रांची में बोन मैरो ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे 60 बच्चों का मामला केवल स्वास्थ्य सुविधा का विषय नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा है। गंभीर रक्त रोगों से जूझ रहे इन बच्चों और उनके परिवारों को समय पर इलाज की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार जल्द आधुनिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा विकसित करती है और प्रतीक्षा सूची में शामिल बच्चों के इलाज की स्पष्ट व्यवस्था करती है, तो यह झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित होगी। साथ ही हजारों परिवारों को नई उम्मीद और राहत भी मिलेगी।

Manish Singh Chandel
Manish Singh Chandelhttps://bhaiyajiinews.in
मनीष सिंह चन्देल रांची और झारखंड से जुड़ी खबरों पर सक्रिय रूप से रिपोर्टिंग करने वाले एक अनुभवी पत्रकार हैं। वे Bhaiyajii News में मुख्य संवाददाता (Chief Reporter) के रूप में कार्यरत हैं और राज्य से जुड़े प्रशासनिक, सामाजिक, शैक्षणिक, रोजगार, कानून व्यवस्था और जनहित के मुद्दों पर नियमित रूप से तथ्यात्मक और ज़मीनी रिपोर्टिंग करते हैं। स्थानीय खबरों की गहरी समझ और तेज़ रिपोर्टिंग के लिए जाने जाने वाले मनीष सिंह चंदेल रांची एवं झारखंड के विभिन्न इलाकों से सामने आने वाली घटनाओं, सरकारी फैसलों और नागरिक समस्याओं को प्राथमिकता के साथ कवर करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग का उद्देश्य आम जनता तक सटीक, निष्पक्ष और भरोसेमंद जानकारी पहुँचाना है। बतौर मुख्य संवाददाता, वे ब्रेकिंग न्यूज़, फॉलो-अप रिपोर्ट, व्याख्यात्मक लेख (Explainables) और जनहित से जुड़ी विशेष रिपोर्ट्स पर काम करते हैं। प्रशासनिक सूत्रों, स्थानीय अधिकारियों और ज़मीनी स्तर की जानकारी के आधार पर तैयार की गई उनकी खबरें पाठकों के बीच विश्वसनीयता के लिए जानी जाती हैं। Manish Singh Chandel मानते हैं कि स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी होती है। इसी सोच के साथ वे रांची और झारखंड के नागरिक मुद्दों, विकास कार्यों, शिक्षा एवं रोजगार से जुड़ी सूचनाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं, ताकि हर वर्ग तक खबर की सही जानकारी पहुँच सके। Bhaiyajii News के साथ उनकी भूमिका सिर्फ खबरें प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे संपादकीय मानकों, तथ्य-जांच और समयबद्ध रिपोर्टिंग को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं।
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