Ranchi Bypass Project : झारखंड की राजधानी रांची में यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया एक महत्वपूर्ण बाईपास सड़क प्रोजेक्ट पिछले कई वर्षों से अधूरा पड़ा है। हैरानी की बात यह है कि इस परियोजना में सबसे बड़ी बाधा कोई कानूनी विवाद, फंड की कमी या तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसी पाइपलाइन है जिसकी मालिकाना पहचान तक सरकारी विभाग नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि मेकॉन अंडरपास से डिबडीह क्रॉसिंग तक बनने वाली वैकल्पिक सड़क का निर्माण लगभग आठ वर्षों से रुका हुआ है।
शहर के ट्रैफिक दबाव को कम करने के लिए शुरू हुई थी परियोजना
रांची में लगातार बढ़ते वाहनों के दबाव को देखते हुए इस बाईपास सड़क की योजना बनाई गई थी। इसका उद्देश्य मुख्य मार्गों पर लगने वाले जाम को कम करना और लोगों को एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराना था। यदि यह सड़क समय पर बन जाती तो शहर के कई इलाकों के बीच आवागमन काफी आसान हो जाता।
लेकिन परियोजना की शुरुआत के दौरान निर्माण एजेंसियों को जमीन के नीचे एक बड़ी पाइपलाइन मिली। इसके बाद काम रोक दिया गया ताकि यह पता लगाया जा सके कि पाइपलाइन किस विभाग या एजेंसी की है और उसे कैसे शिफ्ट किया जाए।
आठ साल बाद भी नहीं मिला जवाब
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई वर्षों की जांच-पड़ताल के बावजूद संबंधित विभाग यह पता नहीं लगा सके कि पाइपलाइन किसकी है। पथ निर्माण विभाग और पेयजल विभाग दोनों के पास इसके संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं है। अधिकारियों के अनुसार पुराने रिकॉर्ड में भी इस पाइपलाइन का कोई उल्लेख नहीं मिल रहा है।
परिणामस्वरूप निर्माण कार्य लगातार टलता गया और परियोजना की लागत भी बढ़ती चली गई। अब यह मामला प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
लोगों को झेलनी पड़ रही भारी परेशानी
सड़क निर्माण रुकने का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। शहर के कई प्रमुख मार्गों पर रोजाना लंबा जाम लग रहा है। कार्यालय जाने वाले कर्मचारी, छात्र, व्यापारी और एंबुलेंस सेवाएं भी यातायात बाधाओं से प्रभावित हो रही हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि वर्षों पहले शुरू हुई सड़क आज तक पूरी नहीं हो सकी, जबकि शहर की आबादी और वाहन संख्या लगातार बढ़ रही है। लोगों को उम्मीद थी कि यह बाईपास मार्ग ट्रैफिक समस्या का समाधान करेगा, लेकिन परियोजना अधूरी रहने से परेशानी और बढ़ गई है।
विभागों के बीच समन्वय की कमी उजागर
यह मामला सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी को भी उजागर करता है। किसी भी बड़े निर्माण कार्य से पहले संबंधित क्षेत्र में मौजूद पाइपलाइन, केबल, बिजली लाइन और अन्य संरचनाओं का पूरा रिकॉर्ड होना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधारभूत संरचनाओं का डिजिटल मैप तैयार किया गया होता तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। कई राज्यों में अब भूमिगत सुविधाओं का जीआईएस आधारित रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है ताकि भविष्य में निर्माण कार्य बाधित न हों।
लागत बढ़ने की आशंका
निर्माण कार्य लंबे समय तक रुके रहने से परियोजना की लागत में भी वृद्धि होना स्वाभाविक है। निर्माण सामग्री, श्रम और अन्य संसाधनों की कीमतों में पिछले आठ वर्षों के दौरान काफी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में यदि अब काम दोबारा शुरू होता है तो सरकार को अतिरिक्त बजट की व्यवस्था करनी पड़ सकती है।
इसके अलावा अधूरी परियोजना के कारण पहले किए गए निर्माण कार्यों के रखरखाव पर भी खर्च बढ़ रहा है।
प्रशासनिक स्तर पर तेज हुई गतिविधियां
हाल के दिनों में इस मामले को लेकर प्रशासनिक स्तर पर फिर से चर्चा शुरू हुई है। संबंधित विभागों को पाइपलाइन की पहचान करने और समाधान निकालने के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि परियोजना को जल्द पूरा करना प्राथमिकता में शामिल है क्योंकि इसका सीधा संबंध शहर की यातायात व्यवस्था से है।
तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से पुराने नक्शों और रिकॉर्ड की समीक्षा की जा रही है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि कहीं पाइपलाइन किसी पुराने औद्योगिक या जलापूर्ति नेटवर्क का हिस्सा तो नहीं है।
शहरी विकास के लिए महत्वपूर्ण है परियोजना
रांची तेजी से विकसित हो रहा शहर है। नई कॉलोनियां, व्यावसायिक केंद्र और संस्थान लगातार विकसित हो रहे हैं। ऐसे में सड़क नेटवर्क का विस्तार और आधुनिकीकरण बेहद आवश्यक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह बाईपास सड़क पूरी हो जाती है तो शहर के कई हिस्सों में ट्रैफिक का दबाव कम होगा। साथ ही लोगों का समय और ईंधन दोनों बचेंगे। इसके अलावा आपातकालीन सेवाओं को भी बेहतर मार्ग उपलब्ध होगा।
भविष्य के लिए सीख
रांची की यह परियोजना भविष्य की आधारभूत संरचना योजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है। किसी भी निर्माण कार्य से पहले भूमिगत सुविधाओं का विस्तृत सर्वेक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यदि समय रहते पाइपलाइन की पहचान कर समाधान निकाल लिया जाता है तो वर्षों से रुकी इस परियोजना को नई गति मिल सकती है। शहर के लाखों नागरिक भी यही उम्मीद कर रहे हैं कि विकास की यह राह जल्द दोबारा खुल सकेगी और रांची को एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक सड़क मार्ग मिल पाएगा।
निष्कर्ष
रांची का यह बाईपास रोड प्रोजेक्ट केवल एक सड़क निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और प्रशासनिक समन्वय की परीक्षा बन चुका है। एक अज्ञात पाइपलाइन के कारण आठ वर्षों से रुका निर्माण कार्य यह दिखाता है कि आधारभूत संरचना परियोजनाओं में सटीक रिकॉर्ड और समन्वय कितना महत्वपूर्ण है। अब सभी की निगाहें प्रशासन पर हैं कि वह इस बाधा को दूर कर परियोजना को कब तक पूरा कर पाता है।







