रांची मेडिकल स्टोर बंद : रांची समेत पूरे झारखंड में ऑनलाइन दवा बिक्री और ई-फार्मेसी के विरोध में मेडिकल दुकानदारों ने बंद का समर्थन किया। इस बंद का असर राजधानी रांची में सबसे ज्यादा देखने को मिला, जहां अधिकांश मेडिकल स्टोर दिनभर बंद रहे। अचानक हुई इस बंदी के कारण मरीजों और उनके परिजनों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
मेडिकल दुकानदारों का कहना है कि ऑनलाइन दवा कंपनियां भारी छूट देकर पारंपरिक मेडिकल स्टोरों के कारोबार को नुकसान पहुंचा रही हैं। इसके साथ ही बिना पर्याप्त निगरानी के दवाओं की ऑनलाइन बिक्री मरीजों की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है। देशभर के केमिस्ट संगठनों के आह्वान पर यह विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया।
रांची में दिखा बंद का व्यापक असर
राजधानी रांची के कई प्रमुख इलाकों में मेडिकल स्टोर पूरी तरह बंद रहे। सुबह से ही मरीज दवाइयों के लिए भटकते नजर आए। खासकर बुजुर्ग, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज और नियमित दवा लेने वाले लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई।
कई लोगों ने बताया कि उन्हें जरूरी दवाइयों के लिए एक से दूसरे इलाके तक जाना पड़ा। कुछ अस्पतालों के आसपास खुले मेडिकल स्टोरों पर लंबी कतारें भी देखने को मिलीं।हालांकि कुछ इमरजेंसी सेवाओं और अस्पताल परिसर के मेडिकल स्टोर खुले रहे, लेकिन आम बाजारों में अधिकांश दुकानों पर ताले लटके दिखाई दिए।
ऑनलाइन दवा बिक्री का क्यों हो रहा विरोध?
मेडिकल दुकानदारों का आरोप है कि online pharmacy कंपनियां नियमों का सही तरीके से पालन नहीं कर रही हैं। उनका कहना है कि कई बार बिना वैध डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन के भी दवाइयां उपलब्ध करा दी जाती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
केमिस्ट संगठनों का यह भी कहना है कि ऑनलाइन कंपनियां भारी डिस्काउंट देकर छोटे मेडिकल दुकानदारों का व्यवसाय खत्म करने की कोशिश कर रही हैं।दुकानदारों के अनुसार पारंपरिक मेडिकल स्टोर केवल दवा बेचने का काम नहीं करते, बल्कि मरीजों को दवा के सही उपयोग और डोज की जानकारी भी देते हैं। वहीं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म में यह मानवीय सहायता नहीं मिल पाती।
देशभर में हुआ विरोध प्रदर्शन
यह विरोध केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहा। देश के कई राज्यों में मेडिकल दुकानदारों ने बंद का समर्थन किया। विभिन्न राज्यों में हजारों मेडिकल स्टोर बंद रखे गए।
केमिस्ट संगठनों का कहना है कि यदि सरकार ऑनलाइन दवा बिक्री पर सख्त नियम लागू नहीं करती, तो भविष्य में और बड़े आंदोलन किए जा सकते हैं।राष्ट्रीय स्तर पर कई संगठन लंबे समय से ई-फार्मेसी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनका कहना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री के लिए स्पष्ट और सख्त नियम होने चाहिए ताकि मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
मरीजों की बढ़ी चिंता
मेडिकल स्टोर बंद होने का सबसे ज्यादा असर उन मरीजों पर पड़ा जो रोजाना दवाइयों पर निर्भर रहते हैं। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, हार्ट और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीजों को समय पर दवा नहीं मिलने की चिंता सताती रही।
कई परिजनों ने कहा कि अचानक बंद की वजह से उन्हें पहले से जानकारी नहीं मिल पाई। कुछ लोग अस्पतालों के बाहर घंटों तक दवाइयों के लिए इंतजार करते रहे।विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बंदी के दौरान सरकार और प्रशासन को इमरजेंसी दवा व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि गंभीर मरीजों को परेशानी न हो।
ऑनलाइन फार्मेसी के पक्ष में भी उठ रही आवाज
जहां मेडिकल दुकानदार ऑनलाइन दवा बिक्री का विरोध कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग ई-फार्मेसी के समर्थन में भी नजर आए। कई मरीजों का कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए घर बैठे दवा मिल जाती है और कीमत भी कम पड़ती है।
सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कई लोगों ने कहा कि बुजुर्गों, दिव्यांगों और दूरदराज के मरीजों के लिए ऑनलाइन दवा सेवा काफी मददगार साबित होती है।कुछ लोगों का मानना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री को पूरी तरह बंद करने के बजाय सरकार को इसके लिए कड़े नियम और निगरानी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।
प्रशासन और सरकार की भूमिका पर सवाल
इस बंद के बाद एक बार फिर दवा बिक्री से जुड़े नियमों और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों की सुरक्षा और सुविधा दोनों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति बनाने की जरूरत है।
हाल के महीनों में मेडिकल स्टोर संचालन और फार्मासिस्ट की उपलब्धता को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों व्यवस्था को पारदर्शी और नियमबद्ध तरीके से संचालित किया जाए, तो मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकती हैं।
छोटे मेडिकल दुकानदारों की चिंता
छोटे मेडिकल दुकानदारों का कहना है कि ऑनलाइन कंपनियों के बढ़ते प्रभाव के कारण उनका कारोबार लगातार प्रभावित हो रहा है। कई दुकानदारों ने बताया कि बड़ी ई-फार्मेसी कंपनियां भारी छूट और ऑफर देकर ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं, जिससे छोटे व्यवसाय टिक नहीं पा रहे हैं।दुकानदारों का कहना है कि मेडिकल स्टोर केवल व्यापार नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा हैं। ऐसे में सरकार को छोटे दुकानदारों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।
क्या हो सकता है आगे?
केमिस्ट संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में आंदोलन और तेज हो सकता है। वहीं सरकार के सामने चुनौती है कि मरीजों की सुविधा, डिजिटल सेवाओं और पारंपरिक मेडिकल व्यवसाय के बीच संतुलन बनाया जाए।विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ रही डिजिटल हेल्थ सेवाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं होगा। लेकिन इसके लिए मजबूत नियम, प्रिस्क्रिप्शन जांच और लाइसेंसिंग सिस्टम अनिवार्य बनाना होगा।
निष्कर्ष
ऑनलाइन दवा बिक्री के विरोध में रांची और झारखंड में मेडिकल स्टोर बंद होने से यह साफ हो गया है कि ई-फार्मेसी का मुद्दा अब बड़ा विवाद बन चुका है। एक ओर पारंपरिक मेडिकल दुकानदार अपने व्यवसाय और नियमों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मरीज डिजिटल सुविधा और सस्ती दवाओं के पक्ष में नजर आ रहे हैं।इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात मरीजों की सुरक्षा और सुविधा है। यदि सरकार समय रहते स्पष्ट और संतुलित नीति नहीं बनाती, तो आने वाले समय में इस तरह के विरोध प्रदर्शन और बढ़ सकते हैं।







