RIMS Blood Bank Crisis : झारखंड की राजधानी रांची में स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) समेत कई सरकारी अस्पताल इन दिनों गंभीर ब्लड संकट से जूझ रहे हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि दुर्घटना, थैलेसीमिया, प्रसूति और गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को समय पर खून नहीं मिल पा रहा है। ब्लड बैंक में स्टॉक लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच गया है, जिससे मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है।
रिप्लेसमेंट डोनर सिस्टम बना बड़ी समस्या
रिम्स और अन्य सरकारी अस्पतालों में मरीजों के परिजनों को खून लेने से पहले रिप्लेसमेंट डोनर लाने के लिए कहा जा रहा है। यानी जितना ब्लड चाहिए, उतना डोनर उपलब्ध कराना अनिवार्य हो गया है। कई मामलों में मरीज के परिजन घंटों तक डोनर की तलाश करते रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार कई लोगों को ब्लड मिलने में 6 से 8 घंटे तक का समय लग रहा है।
इस स्थिति का सबसे अधिक असर गरीब और दूरदराज से आने वाले मरीजों पर पड़ रहा है। कई परिवार ऐसे हैं जिनके पास शहर में कोई परिचित नहीं होता और वे अचानक डोनर की व्यवस्था नहीं कर पाते। ऐसे में इलाज में देरी होने का खतरा बढ़ जाता है।
दुर्घटना और इमरजेंसी मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित
रिम्स राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है, जहां झारखंड के लगभग हर जिले से मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। सड़क दुर्घटना, ऑपरेशन, प्रसव और गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को तत्काल ब्लड की जरूरत पड़ती है। लेकिन वर्तमान संकट के कारण कई मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है।
डॉक्टरों का कहना है कि कई बार इमरजेंसी में मरीज की जान बचाने के लिए तुरंत रक्त चढ़ाना जरूरी होता है। लेकिन ब्लड उपलब्ध नहीं होने से स्थिति गंभीर बन जाती है। थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया के मरीजों को नियमित अंतराल पर रक्त चढ़ाना पड़ता है, ऐसे मरीजों के लिए यह संकट बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
रक्तदान शिविरों की कमी बनी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि रक्तदान शिविरों की कमी और जागरूकता की कमी इस संकट की सबसे बड़ी वजहों में शामिल है। सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा नियमित रक्तदान शिविर आयोजित नहीं किए जा रहे हैं। गर्मी के मौसम और छुट्टियों के कारण भी रक्तदान करने वालों की संख्या कम हो गई है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में हर दिन सैकड़ों यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, लेकिन संग्रह उसकी तुलना में काफी कम है। रांची में ही रोजाना लगभग 350 से 400 यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती है।
मरीजों के परिजनों की बढ़ी मुश्किलें
ब्लड बैंक के बाहर मरीजों के परिजनों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। कई लोग सुबह से शाम तक रक्त मिलने का इंतजार करते रहते हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए डोनर तलाश रहे हैं।
एक मरीज के परिजन ने बताया कि उनके परिवार में किसी का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हो रहा था, जिसके कारण इलाज में देरी हुई। कई लोगों ने आरोप लगाया कि अस्पतालों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों को निजी एजेंसियों और बिचौलियों का सहारा लेना पड़ रहा है।
हाई कोर्ट भी जता चुका है चिंता
झारखंड हाई कोर्ट ने भी राज्य में ब्लड संकट और रिप्लेसमेंट डोनर व्यवस्था को लेकर चिंता जताई थी। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि रक्त को “ब्लड के बदले ब्लड” की शर्त पर देना मानवता के खिलाफ है। कोर्ट ने राज्य सरकार को स्वैच्छिक रक्तदान प्रणाली को मजबूत करने और ब्लड बैंकों की व्यवस्था सुधारने का निर्देश दिया था।इसके बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा। मरीजों के परिजनों का कहना है कि आज भी कई अस्पतालों में बिना डोनर ब्लड मिलना मुश्किल है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते ब्लड स्टॉक नहीं बढ़ाया गया तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। बारिश और संक्रमण के मौसम में डेंगू, मलेरिया और अन्य बीमारियों के कारण रक्त की मांग और बढ़ जाती है।डॉक्टरों का मानना है कि युवाओं को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और निजी कंपनियों को बड़े स्तर पर रक्तदान अभियान चलाना चाहिए ताकि संकट को कम किया जा सके।
रिम्स की व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
रिम्स पहले से ही आधारभूत सुविधाओं की समस्याओं को लेकर चर्चा में रहा है। अस्पताल में भवनों की खराब स्थिति, भीड़ और संसाधनों की कमी को लेकर कई बार शिकायतें सामने आ चुकी हैं। अब ब्लड संकट ने स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों को और उजागर कर दिया है। कई सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि ब्लड बैंकों को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए और ऑनलाइन ब्लड उपलब्धता सिस्टम को मजबूत किया जाए ताकि मरीजों को तत्काल जानकारी मिल सके।
सरकार और प्रशासन से उम्मीद
फिलहाल मरीजों और उनके परिजन सरकार तथा स्वास्थ्य विभाग से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद लगाए बैठे हैं। यदि जल्द ही बड़े स्तर पर रक्तदान शिविर और जागरूकता अभियान शुरू नहीं किए गए तो संकट और गहरा सकता है।विशेषज्ञों का कहना है कि रक्तदान केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि किसी की जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा माध्यम है। राज्य में ब्लड संकट को दूर करने के लिए सरकार, अस्पताल प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर काम करना होगा।







