झारखंड में लोकायुक्त नियुक्ति पर हाईकोर्ट सख्त, RTI कार्यकर्ताओं के विरोध के बीच सरकार से मांगा जवाब | Jharkhand News | Bhaiyajii News

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रांची: झारखंड में लंबे समय से लंबित लोकायुक्त नियुक्ति का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। इस मुद्दे पर झारखंड हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर नाराजगी जताई। वहीं, दूसरी ओर RTI कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है।

राज्य में लोकायुक्त और अन्य संवैधानिक संस्थाओं में लंबे समय से रिक्त पदों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब यह मामला न्यायपालिका के हस्तक्षेप और जनता के विरोध के कारण और ज्यादा गंभीर हो गया है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

झारखंड हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को लंबे समय तक खाली रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर इतने महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति में देरी क्यों हो रही है।कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकायुक्त जैसी संस्था भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बेहद जरूरी है और इसे निष्क्रिय रखना आम जनता के अधिकारों का हनन है।पहले भी हाईकोर्ट राज्य सरकार को लोकायुक्त नियुक्ति जल्द पूरा करने का निर्देश दे चुका है, लेकिन अब तक ठोस प्रगति नहीं होने पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया है।

चार साल से खाली हैं अहम पद

जानकारी के अनुसार, झारखंड में लोकायुक्त सहित कई संवैधानिक संस्थाओं के पद लंबे समय से खाली हैं। हाईकोर्ट ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि चार साल तक इन संस्थाओं को बिना प्रमुख के चलाना किसी भी हाल में उचित नहीं है।अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी संस्थाएं लोकतंत्र की रीढ़ होती हैं और इनके निष्क्रिय रहने से शासन व्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है।

RTI कार्यकर्ताओं का विरोध तेज

लोकायुक्त नियुक्ति में देरी को लेकर RTI कार्यकर्ताओं ने भी मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि राज्य में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लोकायुक्त और सूचना आयोग जैसी संस्थाओं का सक्रिय होना जरूरी है।RTI कार्यकर्ताओं का आरोप है कि लंबे समय से इन पदों को खाली रखकर सरकार जवाबदेही से बच रही है।कई सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर प्रदर्शन किया और सरकार से जल्द नियुक्ति की मांग की। उनका कहना है कि जब तक ये संस्थाएं पूरी तरह सक्रिय नहीं होंगी, तब तक भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है।

सूचना आयोग भी रहा निष्क्रिय

केवल लोकायुक्त ही नहीं, बल्कि राज्य सूचना आयोग भी लंबे समय तक निष्क्रिय रहा है। आयोग में आयुक्तों के पद खाली रहने के कारण RTI से जुड़े मामलों का निपटारा नहीं हो पा रहा था।

इससे आम नागरिकों को जानकारी पाने के अधिकार में बाधा उत्पन्न हुई। हाईकोर्ट ने इस मामले में भी सख्त रुख अपनाते हुए सरकार को आयोग को जल्द सक्रिय करने का निर्देश दिया था।

क्या है लोकायुक्त की भूमिका?

लोकायुक्त एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, जिसका काम सरकार और प्रशासन में भ्रष्टाचार की जांच करना होता है। यह संस्था मंत्रियों, विधायकों और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की जांच करती है।इसका गठन जनता को न्याय दिलाने और प्रशासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए किया गया था। ऐसे में इसका लंबे समय तक निष्क्रिय रहना गंभीर चिंता का विषय माना जा रहा है।

बार-बार दिए गए निर्देश, फिर भी देरी

हाईकोर्ट ने पहले भी सरकार को लोकायुक्त की नियुक्ति जल्द करने का निर्देश दिया था। यहां तक कि छह सप्ताह के भीतर नियुक्ति पूरी करने की समयसीमा भी तय की गई थी।इसके बावजूद नियुक्ति प्रक्रिया में देरी जारी रहने से अदालत ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि यदि सरकार ने जल्द कार्रवाई नहीं की, तो कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

सरकार का पक्ष

सरकार की ओर से अदालत में कहा गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया जारी है और जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि चयन समिति के गठन और अन्य औपचारिकताओं के कारण प्रक्रिया में समय लग रहा है।हालांकि, अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि इतनी लंबी देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

लोकतंत्र और पारदर्शिता पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकायुक्त और सूचना आयोग जैसी संस्थाएं लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी हैं।इन संस्थाओं के निष्क्रिय रहने से भ्रष्टाचार के मामलों की जांच प्रभावित होती है और आम जनता को न्याय मिलने में देरी होती है।इसके अलावा, RTI कानून का प्रभाव भी कम हो जाता है, जिससे नागरिकों के अधिकार कमजोर पड़ते हैं।

आगे क्या?

अब इस मामले की अगली सुनवाई में हाईकोर्ट सरकार से स्पष्ट जवाब मांग सकता है। कोर्ट यह भी देखेगा कि सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अब तक क्या कदम उठाए हैं।यदि सरकार तय समय में नियुक्ति नहीं करती है, तो अदालत कड़े निर्देश या कार्रवाई भी कर सकती है।

निष्कर्ष

झारखंड में लोकायुक्त नियुक्ति का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है। एक ओर हाईकोर्ट सख्त रुख अपनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर RTI कार्यकर्ता और आम जनता भी जवाब मांग रही है।ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मामले में कितनी तेजी से कार्रवाई करती है और क्या राज्य में पारदर्शिता की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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