जमशेदपुर: देश की अग्रणी इस्पात कंपनी टाटा स्टील ने पर्यावरण-अनुकूल स्टील उत्पादन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने जमशेदपुर स्थित अपने संयंत्र में अत्याधुनिक EASyMelt (Electrically Assisted Syngas Smelter) तकनीक लागू करने के लिए लगभग ₹2,500 करोड़ निवेश करने की योजना बनाई है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन को 50 प्रतिशत से अधिक कम करना और स्टील उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाना है।
क्या है EASyMelt तकनीक?
EASyMelt एक नई और उन्नत लौह उत्पादन तकनीक है, जिसे SMS Group के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। यह तकनीक पारंपरिक कोक-आधारित ब्लास्ट फर्नेस पर निर्भरता कम करती है और सिंथेटिक गैस (Syngas) तथा विद्युत ऊर्जा का उपयोग करके लौह उत्पादन को अधिक ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल बनाती है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है, जिससे पूरी उत्पादन प्रणाली बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
जमशेदपुर प्लांट में होगी पहली औद्योगिक स्थापना
टाटा स्टील ने घोषणा की है कि दुनिया में पहली बार EASyMelt तकनीक का औद्योगिक स्तर पर उपयोग जमशेदपुर स्थित कंपनी के ‘E’ ब्लास्ट फर्नेस में किया जाएगा। परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा ताकि उत्पादन पर न्यूनतम प्रभाव पड़े और तकनीक का सुरक्षित परीक्षण किया जा सके।
कार्बन उत्सर्जन में 50% से अधिक कमी का लक्ष्य
इस परियोजना का सबसे बड़ा उद्देश्य स्टील उत्पादन के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना है। कंपनी के अनुसार, नई तकनीक लागू होने के बाद संबंधित ब्लास्ट फर्नेस से निकलने वाला CO₂ उत्सर्जन मौजूदा स्तर की तुलना में 50 प्रतिशत से अधिक कम किया जा सकेगा।
इससे भारत के ग्रीन स्टील मिशन और जलवायु परिवर्तन से जुड़े लक्ष्यों को भी मजबूती मिलेगी।
कोक की खपत भी होगी कम
पारंपरिक स्टील उत्पादन में कोक (Coke) का व्यापक उपयोग होता है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। EASyMelt तकनीक कोक की आवश्यकता को काफी कम कर सकती है। इससे उत्पादन लागत और पर्यावरणीय प्रभाव—दोनों में कमी आने की संभावना है।
SMS Group के साथ साझेदारी
इस परियोजना के लिए टाटा स्टील ने जर्मनी की इंजीनियरिंग कंपनी SMS Group (Paul Wurth) के साथ समझौता किया है। दोनों कंपनियां मिलकर EASyMelt तकनीक को विकसित और लागू करेंगी।
टाटा स्टील के सीईओ एवं एमडी टी. वी. नरेंद्रन ने कहा कि कम-कार्बन स्टील उत्पादन भविष्य की आवश्यकता है और यह परियोजना कंपनी की नेट-ज़ीरो उत्सर्जन रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
झारखंड के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
जमशेदपुर टाटा स्टील का प्रमुख उत्पादन केंद्र है। इस निवेश से राज्य को कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है—
- उन्नत औद्योगिक तकनीक का विकास
- स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा
- इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए नए अवसर
- हरित औद्योगिक निवेश में वृद्धि
- दीर्घकालिक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में अन्य संयंत्रों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है।
भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य को मिलेगा समर्थन
भारत ने आने वाले वर्षों में कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने का लक्ष्य तय किया है। इस्पात उद्योग देश के सबसे अधिक ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में से एक है। ऐसे में कम-कार्बन तकनीकों को अपनाना राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
टाटा स्टील की यह पहल औद्योगिक क्षेत्र में हरित तकनीक को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
भविष्य की संभावनाएं
यदि EASyMelt तकनीक का औद्योगिक परीक्षण सफल रहता है, तो इसे अन्य ब्लास्ट फर्नेस और इस्पात संयंत्रों में भी लागू किया जा सकता है। इससे न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी बल्कि भारतीय स्टील उद्योग वैश्विक ग्रीन स्टील बाजार में भी अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत कर सकेगा।
निष्कर्ष
जमशेदपुर में EASyMelt तकनीक पर लगभग ₹2,500 करोड़ का निवेश टाटा स्टील की दीर्घकालिक पर्यावरणीय और औद्योगिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कार्बन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी लाने का लक्ष्य, आधुनिक तकनीक का उपयोग और वैश्विक स्तर पर पहली औद्योगिक स्थापना इस परियोजना को विशेष बनाती है। आने वाले वर्षों में यह पहल न केवल झारखंड बल्कि पूरे भारतीय इस्पात उद्योग के लिए एक नई दिशा तय कर सकती है।







