गुमला की लापता बच्ची का मामला: झारखंड हाई कोर्ट की सख्ती, SP को कड़ी फटकार | Jharkhand News | Bhaiyajii News

गुमला लापता बच्ची मामला | Jharkhand News | Bhaiyajii News

गुमला लापता बच्ची मामला: गुमला जिले में आठ साल से लापता एक बच्ची के मामले ने एक बार फिर झारखंड में पुलिस की कार्यप्रणाली, सामाजिक अंधविश्वास और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संवेदनशील प्रकरण की सुनवाई के दौरान झारखंड हाई कोर्ट ने गुमला के पुलिस अधीक्षक (SP) को कड़ी फटकार लगाते हुए साफ शब्दों में कहा कि लापता बच्चों के मामलों में इस तरह की ढिलाई स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने मामले की प्रगति पर असंतोष जताते हुए पुलिस से जवाब तलब किया और प्रभावी कार्रवाई के निर्देश दिए।

क्या है पूरा मामला

गुमला जिले के एक ग्रामीण क्षेत्र से करीब आठ वर्ष पूर्व एक नाबालिग बच्ची रहस्यमय तरीके से लापता हो गई थी। परिजनों ने तत्काल स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन शुरुआती जांच के बाद भी बच्ची का कोई ठोस सुराग सामने नहीं आया। समय बीतता गया, जांच फाइलों में सिमटती चली गई और परिवार न्याय की उम्मीद में दर-दर भटकता रहा।

मामले की सबसे दर्दनाक परत तब सामने आई जब बच्ची की मां पर डायन-बिसाही (जादू-टोना) का आरोप लगाया गया। ग्रामीण अंधविश्वास के चलते महिला को न केवल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और धमकियों का भी सामना करना पड़ा। पीड़िता के परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें पर्याप्त सुरक्षा तक मुहैया नहीं कराई।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ

मामला जब झारखंड हाई कोर्ट पहुँचा, तो अदालत ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि—

“आठ वर्षों तक किसी बच्ची का पता न चलना और जांच में ठोस प्रगति न होना, पुलिस की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।”

कोर्ट ने गुमला के SP को फटकार लगाते हुए पूछा कि अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए और क्यों इस मामले में कोई निर्णायक परिणाम सामने नहीं आया। अदालत ने निर्देश दिया कि बच्ची की तलाश के लिए विशेष टीम गठित की जाए और आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर जांच को आगे बढ़ाया जाए।

अंधविश्वास बना इंसाफ की राह में बाधा

यह मामला केवल एक लापता बच्ची तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड के कुछ इलाकों में आज भी फैले डायन-बिसाही जैसे अंधविश्वास की भयावह तस्वीर पेश करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आरोप अक्सर महिलाओं और कमजोर वर्गों को निशाना बनाते हैं।

गुमला, सिमडेगा और खूंटी जैसे जिलों में समय-समय पर डायन के आरोप में मारपीट, सामाजिक बहिष्कार और यहां तक कि हत्या तक की घटनाएं सामने आती रही हैं। इस केस में भी बच्ची की मां को आरोपी की तरह देखा गया, जबकि असल में वह खुद पीड़िता थी।

पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल

हाई कोर्ट की सख्ती ने पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि—

  • आठ साल में बच्ची की तलाश में कितनी बार व्यापक तलाशी अभियान चलाया गया?
  • क्या मोबाइल ट्रैकिंग, सोशल नेटवर्क और अन्य तकनीकी साधनों का उपयोग किया गया?
  • पीड़ित परिवार को सुरक्षा और कानूनी सहायता क्यों नहीं मिली?

अदालत ने स्पष्ट किया कि लापता बच्चों के मामलों में समय सबसे अहम तत्व होता है। शुरुआती चूक बाद में बड़े अपराध को जन्म दे सकती है।

प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी

इस प्रकरण ने यह भी साबित किया है कि केवल पुलिस ही नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि अंधविश्वास के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाए। सरकार द्वारा बनाए गए डायन प्रथा उन्मूलन कानून तभी प्रभावी होंगे, जब उनका सख्ती से पालन कराया जाए।

सामाजिक संगठनों का कहना है कि—

  • गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाए जाएं
  • महिलाओं को कानूनी अधिकारों की जानकारी दी जाए
  • पुलिस को ऐसे मामलों में संवेदनशील प्रशिक्षण दिया जाए

हाई कोर्ट के निर्देश और आगे की राह

हाई कोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई तक पुलिस से विस्तृत प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। साथ ही यह भी निर्देश दिया है कि बच्ची की मां को सुरक्षा प्रदान की जाए और डायन-बिसाही के आरोप लगाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

न्यायालय का यह रुख साफ संकेत देता है कि अब ऐसे मामलों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी

निष्कर्ष

गुमला की लापता बच्ची का यह मामला झारखंड में न्याय, सुरक्षा और सामाजिक चेतना की बड़ी परीक्षा है। एक ओर जहां एक परिवार आठ साल से अपने बच्चे का इंतजार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अंधविश्वास और प्रशासनिक सुस्ती ने उनके दर्द को और गहरा कर दिया।

हाई कोर्ट की सख्ती से उम्मीद जगी है कि अब इस मामले में ठोस कार्रवाई होगी और सच सामने आएगा। साथ ही यह प्रकरण पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि अंधविश्वास और लापरवाही मिलकर सबसे पहले मासूमों को ही निगलते हैं

डिस्क्लेमर

यह लेख विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। किसी भी व्यक्ति या संस्था की छवि को ठेस पहुँचाना उद्देश्य नहीं है। जांच प्रक्रिया जारी है, अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच पर निर्भर करेगा।

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