फारस की खाड़ी में फंसे रांची के मर्चेंट नेवी कैप्टन राकेश रंजन सिंह की मौत, परिवार ने सरकार से लगाई गुहार | Jharkhand News | Bhaiyajii News

Rakesh Ranjan Singh | Jharkhand News | Bhaiyajii News

Rakesh Ranjan Singh : झारखंड की राजधानी रांची से जुड़ी एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। मर्चेंट नेवी के अनुभवी कैप्टन राकेश रंजन सिंह की फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में जहाज पर ही दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। यह घटना न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे राज्य के लिए गहरा सदमा बनकर सामने आई है।

बताया जा रहा है कि कैप्टन राकेश रंजन सिंह पिछले कई दिनों से अपने जहाज के साथ खाड़ी क्षेत्र में फंसे हुए थे। क्षेत्र में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण उनका जहाज आगे नहीं बढ़ सका।

20 दिनों तक समुद्र में फंसा रहा जहाज

जानकारी के अनुसार, कैप्टन राकेश रंजन सिंह एक ऑयल टैंकर जहाज पर तैनात थे, जो फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण समुद्र में ही रुक गया। जहाज लगभग 18 से 20 दिनों तक दुबई के तट से कुछ दूरी पर खड़ा रहा।इस दौरान जहाज पर करीब 30 से अधिक क्रू मेंबर मौजूद थे। लगातार तनाव, अनिश्चितता और कठिन परिस्थितियों में काम करना सभी के लिए चुनौतीपूर्ण था। बताया जा रहा है कि इन हालातों का असर कैप्टन राकेश की सेहत पर भी पड़ा।

अचानक बिगड़ी तबीयत, नहीं मिल सकी समय पर मदद

18 मार्च को अचानक कैप्टन राकेश रंजन सिंह की तबीयत बिगड़ गई। जहाज पर मौजूद कर्मचारियों ने तुरंत मदद के लिए एयर एम्बुलेंस की मांग की, लेकिन क्षेत्र में जारी संघर्ष और सुरक्षा कारणों से अनुमति नहीं मिल सकी।इसके बाद उन्हें नाव के जरिए दुबई तट तक लाने की कोशिश की गई, लेकिन इस प्रक्रिया में काफी देर हो गई। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने उनकी मौत का कारण हार्ट अटैक (कार्डियक अरेस्ट) बताया।

दुबई में रखा गया पार्थिव शरीर

मृत्यु के बाद कैप्टन राकेश का पार्थिव शरीर दुबई के शेख राशिद अस्पताल की मोर्चरी में रखा गया है। फिलहाल कानूनी प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के कारण शव को भारत लाने में देरी हो रही है।परिवार ने बताया कि दुबई पुलिस, भारतीय दूतावास और अन्य एजेंसियों से मंजूरी मिलने के बाद ही शव भारत लाया जा सकेगा। रमजान और अन्य कारणों से प्रक्रिया और धीमी हो गई है।

परिवार की भावुक अपील – “हमें उनका शव वापस चाहिए”

कैप्टन राकेश रंजन सिंह के परिवार ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है। उनके बेटे ने रक्षा राज्य मंत्री और संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर शव को जल्द से जल्द भारत लाने की मांग की है।परिवार का कहना है कि कैप्टन राकेश ही उनके घर के मुख्य कमाने वाले सदस्य थे और उनकी अचानक मौत से परिवार पूरी तरह टूट गया है।उनके रिश्तेदारों का कहना है कि अगर समय पर मेडिकल सुविधा मिल जाती, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी।

20 साल का अनुभव, परिवार का सहारा थे राकेश

कैप्टन राकेश रंजन सिंह मर्चेंट नेवी में करीब दो दशकों से अधिक समय से सेवा दे रहे थे। वे मूल रूप से बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले थे, लेकिन लंबे समय से रांची में अपने परिवार के साथ रह रहे थे।उनके परिवार में पत्नी और दो बेटे हैं, जिनमें एक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है जबकि दूसरा स्कूल में है। उनकी मौत के बाद परिवार पर आर्थिक और मानसिक संकट गहरा गया है।

अधूरा रह गया अयोध्या जाने का सपना

परिवार के अनुसार, कैप्टन राकेश ने अपने परिवार के साथ अयोध्या जाकर राम मंदिर के दर्शन करने का वादा किया था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और उनका यह सपना अधूरा रह गया।

मर्चेंट नेवी के खतरनाक हालात फिर आए सामने

यह घटना मर्चेंट नेवी में काम करने वाले कर्मचारियों की कठिन और जोखिम भरी जिंदगी को उजागर करती है। समुद्र में लंबे समय तक रहना, आपातकालीन परिस्थितियों में सीमित मेडिकल सुविधा और अंतरराष्ट्रीय तनाव—ये सभी कारक उनके काम को बेहद चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर मेडिकल और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

सरकार से उम्मीद

परिवार और स्थानीय लोगों ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि:

  • पार्थिव शरीर को जल्द भारत लाया जाए
  • परिवार को आर्थिक सहायता दी जाए
  • घटना की जांच कर जिम्मेदारियों को तय किया जाए

बताया जा रहा है कि सरकार ने मामले को संज्ञान में लिया है और प्रक्रिया को तेज करने का प्रयास किया जा रहा है।

निष्कर्ष

कैप्टन राकेश रंजन सिंह की मौत केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक परिवार के सपनों और सहारे के टूटने की कहानी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि देश के लिए काम करने वाले हजारों समुद्री कर्मचारी कितनी कठिन परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाते हैं।अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और संबंधित एजेंसियां कितनी जल्दी उनके पार्थिव शरीर को भारत लाने और परिवार को न्याय दिलाने में सफल होती हैं।

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